उम्र की गरिमा को स्वीकार कीजिए…

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आजकल एक फैशन सा बन गया है कि आप चाहे कितने ही साल के क्यों न हों पर बताना 5 से 7 साल कम ही है और हमे अनुसरण और 10 साल कम ही का करना है ।
सच कहूँ तो मै समझ ही नहीं पा रही कि आखिर ऐसा क्यों होता है ।क्यों हम ये खुले दिल सेये स्वीकार ही नहीं कर पाते कि हम बढ़ती उम्र की तरफ बढते जा रहे हैं। सिर्फ ….सिर्फ एक सफेद बाल दिखते ही दिल दिमाग एक साथ आन्दोलन पर उतर जाते हैं। समझ ही नहीं आता कि ऐसा क्या करें जिससे हर साल हम अपना पिछला जन्मदिन मनाए।हमारा हर रोज़ एक घण्टा हमारा चेहरा मोहरा देखने में ही बिता रहे हैं। और बाकी का दिन उस एक घण्टे के आंकलन में। खुदा ना खास्ता अगर हंसते समय एक सिलवट भी नज़र आ गयी तो कयामत ही होनी है। बस हम शुरू हो जाते हैं बिना बादाम खाए हजारों रुपये फूंकने में। आजकल हर कमी का इलाज हो रहा है ललाट से शुरू करते हैं तो पैरों अंगूठे तक का जहाँ हम तनाव लिए बैठे हैं वही इस तनाव से कुछ दुकानें हजारों रुपये इधर उधर कर रही है। मन तनावग्रस्त और जेबें बिलकुल तनाव रहित कहने को भी एक सिलवट नहीं बचती। फिर भी हम खुश नहीं। ये हुआ दिखता हुआ एक मलाल पर हद तो वहाँ बेहद होने लगती जब कहीं से आण्टी शब्द कान मे यूँ ही सुनाई पड़ जाता है। हम किसी भी परिस्थिति में सन्तुलन स्थापित करने में खुद को बहुत लाचार पाते हैं । इधर एक तनाव रजोनिवृति का मनोवैज्ञानिक असर दिखाता है दूसरी तरफ सुन्दरता का तनाव ऊपर से सम्बोधनों मे निरन्तर परिवर्तन। हम समझ ही नहीं पाते कि क्या करें और क्या नहीं और यही उधेडबुन हमे सौ बिमारियों की तरफ ले जाती है और हम स्वयं को काफी निस्सहाय सा पाने लगते हैं। मुझे समझ ही नहीं आता कि उम्र का बढ़ना हम स्वीकार क्यो नही कर पा रहे हैं।
रजोनिवृति हमें एक शारीरिक जिम्मेदारियों से मुक्त कर रही
है ।हां कुछ मनोवैज्ञानिक स्थितियों होती है जिनके लिए जिस तरह 13-14 साल की आयु में तैयार होते हैं वही तैयारी हमें 45-47 की उम्र में करनी होती है। फिर बात चेहरे की सलवटों की हो या सम्बोधनों मे परिवर्तन का हमें हर स्थिति के लिए खुद को तैयार कर लेना चाहिए। हमे धीरे धीरे स्वयं को इस बात के लिए तैयार कर लेना होगा कि हम ज्यादा सुन्दर हो रहें है क्योंकि अब हमारे पास परिक्वता और अनुभवों का बेशुमार खजाना है। उम्र का हर बढ़ता हुआ एक साल हमे और भी ज्यादा गरिमामयी बना रहा है सकारात्मकता से सोचना शुरू कीजिए कि हर बात के लिए बाहर निर्भर रहने की बजाय अपने मन से शुरूआत कीजिए। आण्टी से नानी दादी बनने का सफर बहुत ही सुन्दर है ।हम अधेड़ वो पेड़ है जो जमीन और फल दोनों सलीके और मजबूती से थामे रहते हैं। तो तनाव की नहीं अपने से लगाव की आदत डालिए। हर उम्र की अपनी एक गरिमा है गर्व से उसे चेहरे पर आने दीजिये। और सभी संबोधनों को थाम कर चलिए ।
यौवन जहाँ सुन्दरता है वही बढती उम्र अपने आप मे एक गरिमा तो जहाँ सुन्दरता को बाहें फैलाए बुलाया था वहीं इस गरिमा को सर माथे पर सजाइये।
उम्र की गरिमा को स्वीकार किजिए।अच्छा लगेगा।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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