कुछ पल ह॔सी के चुराइए।

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चलिए फिर आज कुछ आपसे साझा करती हूँ।
व्यावसायिक व्यस्तता के कारण मैं घर के सभी काम दिन में सुबह शाम के हिसाब से बांट कर करती हूँ। अभी कल की ही बात है मैं शाम को पौंछा लगा रही थी तभी बेटा मेरे पास से निकला।मेरी एक अच्छी आदत कह लीजिये या बुरी मैं पौंछा लगाते समय बिलकुल हिटलर बन जाती हूँ मुझे मेरे पौंछे लगाते वक़्त किसी का भी आना जाना और गीले फ़र्श पर पैर लगाना बिलकुल पसंद नहीं खैर बेटा पास मे से गुज़रा अपनी आदतानुसार मै उसे टोकने ही वाली थी कि वो मुझे गले लगा कर बोला ” मैं जानता हूँ कि आपका नाम मक्सूद भाई है और आप पिछले 4 सालों से इस कम्पाउन्ड मे पौंछा लगा रहे हो ” और गीले फ़र्श पर पैर लगाता हुआ निकल गया । और मै उसे प्यार और गुस्से के साथ ढेर सारी हंसी के साथ जाते हुए देखती रही। बात यहीं खत्म नहीं होनी थी ।उसी दिन मेरी सहेलियों और बहन के फोन आए।और हर एक से मैने ये बात साझा की अगले दिन काॅलेज जाकर अपने सहयोगियों के साथ भी साझा की और काफी देर तक हम हंसते और अपने अनुभव साझा करते गये दिन भर कार्यस्थल का माहौल बड़ा अच्छा रहा।और आज आपसे साझा करते हुए फिर बहुत अच्छा अनुभव कर रही हूँ।
आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी क्या ले कर बैठ गई। खैर आपको याद दिला दूं कि ये डायलाॅग मुन्ना भाई एम बी बी एस फिल्म का है और बेटा मेरे व्यस्ततम समय को थोड़ा हल्का फुल्का बना रहा था ।महज़ एक डायलाॅग ने तीन दिन तक मुझे और मेरे सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को गुदगुदा दिया । आप फिर सोच रहे होंगे कि मै आपसे क्यों साझा कर रही हूँ। आज 15 -16 महिने के लाॅकडाऊन और वित्तीय परेशानियों के बीच कुछ मनोसामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से सभी किसी न किसी तरह से परेशान चल रहे हैं और सच मानिये जिन परिस्थितियों से दो चार हो रहे हैं उनमे ये स्वाभाविक ही है। पर थोड़ा रुक जाइए इन परिस्थितियों में भी कुछ ऐसे ही हल्के फुल्के पल चुराइए और स्वयं के साथ सभी को भी एक संतुलन स्थापित करने मे हिस्सेदार बनिए। हो सकता है आपका एक हंसी भरा पल किसी को अपनी परेशानियों से उपजे मनोभावों को सम्भालने में मददगार साबित हो सके ।हम सभी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप से पिछले कुछ महिनो से एक गम्भीरता ओढ़े हुए चल रहे हैं और शत प्रतिशत ये उन्हीं परिस्थितियों का दुष्परिणाम ही है। पर इन्हें और ज्यादा कठिन मत बनने दीजिए कि हमे स्वयं को समझने और सम्भालने के वक़्त ही हाथ से निकल जाए ।ये भी सही है कि हम सभी की कोई बड़ी मदद नहीं कर सकते पर हमारी ज़रा सी ह॔सी की एक कोशिश माहौल कुछ अच्छा जरुर कर सकती है।थोड़ा कठिन है पर असंभव नहीं हम सभी इन परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं तो हम सभी को एक दूसरे का संबल बनना चाहिए सभी एक दूसरे को सहयोग करे तो देखियेगा जो मनोवैज्ञानिक और मनोसामाजिक कठिनाइयों के फलस्वरूप होने वाले परिणामों की खबरें हम अखबारों मे पढ रहे हैं उनमें कुछ तो कमी आएगी ही । समय कठिन ज़रूर है बस इसे थोड़ा धैर्य से बिताइये और इस भारी समय में कुछ पल ह॔सी के चुराइए। जो मानसिक शांति हमारी वजह से किसी और को मिलेगी हो सकता है कि वही हमारी आत्मिक शांति का कारण बन जाए ।और अभी यही तो हम चाहते हैं।
है ना।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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