कोरोना की दहशत

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मन बहुत विचलित है, धैर्य की सीमाएं टूटती जा रहीं है, हर पल व्याकुलता बढ़ती ही जा रहीं है। सहनशीलता की पराकाष्ठा भी अब पार हो गयीं है। दिन भर किसी परिजन या परिचितों की अस्वस्थता की ख़बरें हिला कर रख देती है। सभी मदद के लिये गुहार लगा रहे है, और हम बेबस और लाचार बनकर जाने कितने अपनों को खोते जा रहे है

महामारी की दहशत बढ़ती ही जा रहीं है, कोई अपनी जवान संतानों को खो रहा है। कोई मीलों दूर से अपने बूढ़े माता -पिता के लिये जरुरी चिकित्सा सहायता भी नहीं जूटा पा रहा। कहीं बूढ़े माता -पिता की चिताओं को आग देने वाला भी कोई नहीं मिल रहा।कुछ को अंतिम दर्शन दिए बिना ही विदाई दी जा रहीं है।

ऐसे संकट काल में भी इंसानियत खो गयीं है, मानवता शर्मसार हो रहीं है। झूठ का कारोबार चारों तरफ है, फैला।

जब बाहर का परिदृश्य इतना भयावह हो तो फिर आप ही बतायें सकारात्मकता कैसे बनाये रखें। मनोबल को ऊँचा कैसे उठाये रखें।

-शैली ✍️

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