‘चाइल्ड युद्ध’ जब भारत ने अंग्रेज़ों को बिना शर्त के पराजय स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया था

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हम सभी इस बात से अवगत हैं की किस तरह अंग्रेज़ों ने सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के लोगों को शोषित करके और सारे संसाधनों को चुरा कर इस महान देश को एक ऐसे अन्धकार में धकेल दिया जिससे हमारा देश आज भी पूरी तरह से नहीं उभर पाया है| किन्तु बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे जिन्हे इस बात की जानकारी होगी की सन १६८६ में भारत और अंग्रेज़ों के बीच में एक ऐसा एकपक्षीय युद्ध हुआ था जहाँ अंग्रेज़ों को न सिर्फ अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा था अपितु ज़मीन पर लेट कर माफ़ी भी मांगनी पड़ी थी|

 

कब और क्यों हुआ था चाइल्ड का युद्ध?

भारत में अंग्रेज़ों द्वारा १६०८ में स्थापित ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार से मोटी कमाई कर रही थी| ब्रिटेन में ढाका के मलमल की मांग ख़ासा बढ़ रही थी किन्तु औरंगज़ेब ने जब व्यापार पर कर और शुल्क बढ़ा दिया तब लंदन में बैठे ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रमुख जोज़ाया चाइल्ड इस बात से क्रोधित हो गए| उन्होंने नौसेना की एक टुकड़ी भेज कर ईस्ट इंडिया कंपनी को सन्देश भेजा की अरब सागर में सारे मुग़ल जहाज़ों को लूट लें| दम्भी अंग्रेजी अधिकारियों ने न केवल मालवाहक जहाज़ किन्तु तीर्थ यात्रियों के जहाज़ों को भी लूटना शुरू कर दिया| इतना ही नहीं जोज़ाया चाइल्ड ने एक और आदेश भी पारित किया की मौजूदा बांग्लादेश में स्थित एक महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थल चटगांव को अपने कब्ज़े में ले लिया जाये| इस बात से आक्रोशित आलमगीर औरंगज़ेब ने अपने एक सेनाध्यक्ष सीरी याकूट को १६८६ में अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग शुरू करने का आदेश दिया|

 

क्या हुआ चाइल्ड के युद्ध का नतीजा?

सीरी याकुट ने करीब बीस हज़ार सैनिक लेकर बम्बई को घेर लिया और तोपों से अंग्रेज़ों को आतंकित कर दिया| मुग़लों द्वारा वार इतना ज़बरदस्त था की अंग्रेज़ों को पलटवार करने का मौका तक नहीं मिला और वह अपने किले में छुप गए| कई अँगरेज़ और उनके सहयोगियों को मौत के घात उतार दिया गया, कई को ज़ंजीरों में बांध कर उनका जुलूस शहर के सड़कों पर निकला गया, कई अँगरेज़ सीरी याकूट से माफ़ी मांग कर उससे जा मिले और कई अँगरेज़ भयभीत होकर अपना धर्म परिवर्तित करने को भी सज्ज हो गए| देश के कोने कोने में अंग्रेज़ों पर प्रहार होने लगे और अंत में सन १६९० में अंग्रेज़ों ने बिना शर्त के हार मान लिया और कुछ जनरल्स को मुग़लिया सल्तनत में भेज कर माफ़ी मांगते हुए सुलहनामा तैयार करने का आग्रह किया|

 

चाइल्ड युद्ध के उपरान्त!

आलमगीर औरंगज़ेब के दरबार में अँगरेज़ों को पेट के बल लेटा दिया गया और उन्हें रोते-गिड़गिड़ाते हुए माफ़ी मांगने पर मज़बूर किया गया| औरंगज़ेब ने उनकी विनती को स्वीकार करते हुए उन्हें माफ़ किया और व्यापार जारी रखने की अनुमति दी किन्तु उनपर कर वसूली को बढ़ा दिया तथा एक कई नियमों वाला करारनामा पर हस्ताक्षर भी करवाया गया|

An observer of shells on the bank of the great unascertained ocean of knowledge.

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