मर्दोंं की लड़ाई में गालियाँ मां-बहनों की क्यों?

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जब बात नारी पुरुष समानता की होती है, तब मन में सवाल आता है कि यदि इक्कीसवीं सदी में नारी पुरुष समानता का बोलबाला है तो मर्दों की लड़ाई में गालियां मां-बहनों की क्यों दी जाती है?  क्या आपने आज तक बाप-भाई के नाम पर दी जाने वाली गाली सुनी है? मेरा कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि बाप-भाई के नाम पर गालियां बननी चाहिए। गालियां चाहे वह किसी के भी नाम पर हो अच्छी नहीं होती। सवाल ये है कि क्यों सभी गालियों में कही न कही औरतों को नीचा दिखाया जाता है? क्यों गालियों के माध्यम से महिलाओं के चरित्र को उछाला जाता है? आखिर क्यों?

गालियों के माध्यम से माँ-बहनों का अपमान 

आप ऐसी कोई गाली याद कीजिए जिसमें किसी की माँ या बहन या उनके प्रायवेट पार्ट का उल्लेख न हो। आखिर किसी पुरुष को नीचा दिखाने या उसे शिकस्त देने के लिए उनके घर की महिलाओं का अपमान करने की क्या आवश्यकता है? क्योंकि हमारे यहां घर की महिलाओं को घर की इज़्ज़त से जोड़ा जाता है। इसलिए ही तो हमारे यहां इज़्ज़त के नाम पर धडल्ले से ऑनर किलिंग होती है। क्या किसी के सम्मान की रक्षा किसी व्यक्ति के जीवन से ज्यादा जरुरी है? संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते है कि इज़्ज़त के नाम पर दुनिया भर में हर पाचवी हत्या भारत में होती है! मतलब साफ़ है कि इंसान को जिंदगी से भी ज्यादा प्यारी उसकी इज़्ज़त है! और इस तथाकथित इज़्ज़त का दारोमदार टिका होता है सिर्फ़ और सिर्फ महिलाओं पर! जरा सी ऊंच नीच हुई नहीं की इज़्ज़त तार तार हो जाती है!! क्या आपने कभी सोचा कि ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हमने महिलाओं की इज़्ज़त को कुछ ज्यादा ही महिमा मंडित किया है। इसी कारण मां-बहनों की इज़्ज़त परिवार की इज़्ज़त और शान बन जाती है। किसी भी चीज को जब हम ज्यादा महिमा मंडित करते है तो उसके खण्डित होने की आशंका मात्र से ही डर जाते है। इसलिए जब किसी परिवार की प्रतिष्ठा को तोड़ना रहता है तो उस परिवार के महिला की इज़्ज़त से खेला जाता है। महिलाओं को मिलनेवाली सामाजिक प्रताड़ना और उत्पीड़न के पीछे यहीं मानसिकता है।

मां-बहनों को दी जाने वाली गालियां

महिलाओं के प्रायवेट पार्ट को लेकर जो गालियाँ बनी है, वो तो इतनी अश्लील है कि उनका मैं उदाहरण के लिए भी प्रयोग करना उचित नहीं समझती। इसलिए कुछ ऐसी गालियाँ बता रहीं हूं, जो शायद आपको गालियाँ न लगे। लेकिन यदि ऐसे शब्दों के समूह को जो मौखिक रूप से हिंसात्मक कार्यवाही के लिए किया गया हो या जिनसे किसी व्यक्ति का अपमान होता हो, उन्हें ही हम गालियाँ कहते है, तो नीचे दी हुई सब लोकोक्तियां भी गालियाँ ही कहलाएगी।

आदमी को खा गई!

यदि किसी महिला का पति मर गया तो उसे कई लोग कहते है कि आदमी को खा गई। बताइए, क्या किसी औरत के मरने पर आपने कभी किसी को यह कहते हुए सुना है कि ”औरत को खा गया!” नहीं न। यदि पत्नी पति को खा सकती है तो पति भी पत्नी को खा सकता है! वास्तव में पति-पत्नी दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रखते है। लेकिन कुछ भी अशुभ होने पर उसका दोष महिला को ही क्यों दिया जाता है? क्या महिला कोई राक्षस है, जो अपने पति को खा जाएगी? ऐसे शब्द बोलने वाले ये क्यों नहीं सोचते कि इन शब्दों से उस महिला को कितना दुःख होता होगा!

दुल्हन वहीं जो पिया मन भाएं

वा…व्व…पिया के मन को भा गई मतलब दुल्हन के जीवन में ख़ुशियां ही ख़ुशियां। मतलब दुल्हन के जीवन का एकमात्र ध्येय होना चाहिए पिया के मन को भाना। वो अपने मैग्नेटिक पावर को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करेगी ताकि पिया के मन को भा सके। कहा जाता है कि पति-पत्नी एक ही रथ के दो पहियों के समान होते है। तो फिर एक पहिए को तो दूसरे पहिए को लुभाने के लिए जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है और दूसरे पहिए को बिल्कुल खुला छोड़ दिया जाता है। ऐसा क्यों? क्या आपने कभी किसी को ऐसा कहते सुना कि “पिया वहीं जो दुल्हन मन भाएं।” जैसे दुल्हन का पिया के मन को भाना जरूरी है, ठीक वैसे ही दूल्हे का दुल्हन के मन को भाना जरूरी क्यों नहीं है?

साली आधी घरवाली

कुछ पुरुष कई बार मजाक मजाक में कहते है कि साली आधी घरवाली। क्या आपको इसमें कुछ गलत लगा? यदि हां, तो मैं सबसे पहले आपको बधाई देती हूं कि अभी आपके मन में महिलाओं के लिए सम्मान की भावना जागृत है। सोचिए, क्या साली की अपनी कोई अस्मिता नहीं है? क्या किसी भी जीजा को अपने साली की अस्मिता से खेलने का हक है? यदि किसी महिला ने मजाक मजाक में ही कह दिया कि ‘देवर आधा घरवाला’! तो? कितना बवाल मचेगा? उस महिला को कुलटा और भी न जाने क्या क्या कह कर संबोधित किया जाएगा। जैसे किसी महिला के लिए उसका देवर भाई समान है, ठीक वैसे ही किसी पुरुष के लिए उसकी साली उसके छोटी बहन जैसी क्यों नहीं है?

पति के दिल का रास्ता उसके पेट से होकर गुजरता है

लड़कियाँ चाहे वह डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक ही क्यों न हो, जैसे ही उनके शादी की बात शुरू होती है, उनके परिवार वाले उन्हें समझाते है कि पति के दिल का रास्ता उसके पेेट से होकर गुजरता है। और वो लड़कियाँ कुकिंग का क्रेश कोर्स करने लग जाती है। मेरा यह कहना कदापि नहीं है कि लड़कियों ने खाना बनाना सीखना नहीं चाहिए। कोरोना ने हमें सीखा दिया कि खाना बनाना सिर्फ़ लड़कियों को ही नहीं तो लड़कों को भी थोड़ा बहुत आना चाहिए। क्योंकि इस दौरान होटले तो बंद थी ही, कामवालियां भी नहीं आ रही थी। मेरा आक्षेप इस बात पर है कि क्या किसी को पता है कि पत्नी के दिल का रास्ता कहां से होकर गुजरता है?

जोरू का गुलाम

जोरू का गुलाम वैसे कहा पुरुषों को जाता है लेकिन निशाने पर होती है महिलाएं। कैसे? यदि कोई पति अपने पत्नी की बात मानता है तो उसे कहा जाता है जोरू का गुलाम। लेकिन जब कोई पत्नी अपने पति की बात मानती है, तो उसे कोई नहीं कहता पति की गुलाम। क्यो? क्योंकि समाज में यह धारणा बनी हुई है कि पत्नियां तो पति की गुलाम रहनी ही चाहिए। हमें ये बात समझनी चाहिए कि पति-पत्नी एक दूसरे के गुलाम नहीं, हमसफर है।

समाज में महिलाओं के प्रति हीनता की भावना इतनी सहजता से मान्य हो गई है कि बार-बार ऐसी गालियाँ सुनते सुनते अब महिलाओं को भी वो अजीब नहीं लगती। लेकिन यदि महिलाओं को सम्मान दिलाने हेतु हमें अपनी भाषा में सुधार करना होगा ताकि हमारा आनेवाला कल बेहतर हो…मौजुदा समय की विभत्स तस्वीर को हम बदल सके…मर्दों की लडाई में गालियां माँ-बहनों को न दे…स्रियों को भी उतना ही सम्मान मिले जितना पुरुषों को मिलता है!!

मैं तुमसर, महाराष्ट्र की रहनेवाली हूं। मैं खुशियां बांटना चाहती हूं...चाहे वह छोटी-छोटी ही क्यों न हो! मैं ने 'आपकी सहेली' नाम से एक ब्लॉग (https://www.jyotidehliwal.com) बनाया है। मैं इस ब्लॉग के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधश्रद्धा दूर करने का, समाज में जागरुकता फैलाने का, किचन टिप्स और रेसिपीज के माध्यम से इंसान का जीवन सरल बनाने के कार्य में लगी हू। • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां प्रकाशित।• IBlogger ने मुझे Blogger of the year 2019 चुना था।

2 COMMENTS

  1. बहुत बहुत चिन्तन कर लिखा हुआ लेख |अक्षर अक्षर कडवा सच भी और गहनता से विचारणीय भी |बहुत बहुत बधाई , हार्दिक शुभ कामनाएं |

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