विश्व पृथ्वी दिवस

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आइए #विश्व_पृथ्वी_दिवस पर पेड़ लगानें और प्लास्टिक का कम से कम प्रयोग करनें का संकल्प लें ।

वैज्ञानिक अध्धयनों से ज्ञात होता है कि अपने आरम्भिक काल में धरती आग का गोला थी फिर ब्रहमांडीय क्रियाओं के फलस्वरूप लाखों करोड़ों वर्षों में पृथ्वी धीरे-धीरे ठंढ़ी हुई और महासागर तथा महाद्वीप विकसित हुए । इसी तरह करोड़ों वर्ष बीतते रहे कि एक दिन समुद्र के अन्दर एक छोटी सी हलचल हुई । यह जीवन का प्रथम प्रस्फुटन था । महासागर के अन्दर माइक्रोव्स (एककोशिकीय जीव) पैदा हुआ था । फिर जब इस जीव नें प्रकाशसंश्लेषण प्रक्रिया से भोजन का निर्माण किया तो आक्सीजन भी उत्पन्न हुआ , जो कि पृथ्वी के वायुमण्डल में चला गया । धीरे-धीरे यही माइक्रोव्स समूचे महासागर पर आधिपत्य कर लिया और वायुमण्ड़ल को आक्सीजन से समृद्ध कर दिया । फिर धीरे-धीरे जीवन बहुकोशिकीय संरचनाओं से काई और फिर पादपों तक पहुँचा । और पृथ्वी वनों से ढंक गयी । फिर इन पेड़-पौधों द्वारा आक्सीजन उत्सर्जन से वायुमण्डल आक्सीजन से और समृद्ध हुआ । फिर इन्हीं आक्सीजन के परमाणुओं नें मिलकर ओजोन बनाया जो हल्की होनें के कारण वायुमण्ड़ल के ऊपरी पर्त पर पहुँचकर पृथ्वी के चहुँओर एक मोटा घेरा बना लिया । ओजोन की इन परतों नें जन्तुओं के लिए हानिकारक सूर्य के अल्ट्रावायलेट रेडियेशन को धरती के वाह्य आवरण से ही परावर्तित करना शुरू कर दिया । इस प्रकार से पौधों नें जन्तुओं (जिसमें हम इंसान भी शामिल हैं) के धरती पर अवतरण के लिए पर्यावरण तैयार किया ।

हमारा पर्यावरण भूमि , हवा और जल का सम्मिलित स्वरूप है । वैज्ञानिक अध्ययन यह बताते हैं कि पृथ्वी तमाम उतारों चढ़ाओं से होकर गुजरी है और विभिन्न कालखण्ड में पृथ्वी पर विभिन्न जानवरों का वर्चस्व रहा । पृथ्वी पर सबसे अन्त में अवतरित होनें वाला प्राणी मनुष्य ही है । मनुष्य जब कंदराओं से बाहर निकलकर अपनीं आदिम अवश्था से सभ्य होनें की ओर अग्रसर हुआ तो उसनें सबसे पहले पशुपालन फिर कृषि सीखा । और कृषि नें हमें प्रदान किया खाद्य सुरक्षा । यह खाद्य सुरक्षा ही थी जिसने हमें आदिम प्रवृत्तियों को छोडकर विकसित होनें में मदद किया ।

अब कृषि के लिए आवश्यकता थी भूमि की तो भूमि हमनें जंगल के एक भाग को जलाकर प्राप्त किया और वहीं से हमनें शुरू किया पर्यावरण नष्ट करनें का एक अन्तहीन सिलसिला । शुरूआत में हम वन के एक भाग को जलाते उस पर कृषि करते फिर छोड़कर दूसरे भाग को जलाते और पहला भाग धीरे-धीरे फिर वन में बदल जाता । लेकिन बाद में हमनें स्थाई खेत बना लिए ।

फिर हमनें घर बनानें के लिए वृक्ष काटा और धीरे-धीरे कागज , कल कारखानों और विकास की अन्य आवश्यकताओं के साथ वनों का विनाश किया । विकास की एक और देन रही कि हमनें जल को भी प्रदूषित करना शुरू कर दिया । फिर हमनें मिट्टी और फूस के पुर्नचक्रण(रिसाइकिल) योग्य घरों को छोडकर कंक्रीट के अधिक टिकाऊ घर बनाने शुरू किए । और वह भूमि जो कभी जंगलों से ढ़ंकी रहती थी आज कंक्रीट के जंगलों से ढंक गयी । और हमनें हवा , पानी ,मिट्टी सबकुछ प्रदूषित कर दिया । रही सही कसर प्लास्टिक नें पूरी कर दी । लेकिन बढ़ती मानव आबादी को संसाधन उपलव्ध करानें के लिए यह हमारी मजबूरी भी है ।

वनों के अन्धाधुन्ध कटान से प्रकृति अब असंतुलित हो गयी है । वर्षा कम हो रही है , गरमी बढ़ रही है । कारखानों से निकलते कार्बनडाइआक्साइड़ , कार्बनमोनोआक्साइड़ , सल्फर युक्त धुएँ , मोटरगाड़ियों से निकलते जहरीले धुँए , एअरकंडीशनर से उत्सर्जित क्लोरोफ्लोरो कार्बन सब मिलकर वैश्विक तापमान बढ़ा रहे हैं और ओजोन परत को भी नुकसान पहुँचा रहे हैं । दरअसल उपरोक्त गैसें ग्रीनहाउस गैसे हैं जो सूर्य के विकरण को अवशोषित कर लेते हैं जिससे गर्मी वायुमण्डल से वापस नहीं जा पाती । तापमान बढ़नें से हिमशिखरों सहित ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघलकर समुद्री जलस्तर बढ़ा रहा है , और समुद्र किनारे की निचली भूमि सहित कुछ द्वीपों के जलमग्न होनें का खतरा है । तमाम बड़े शहर सागर तटों पर ही बसे हैं । कहीं ऐसा न हो कि हमारी लापरवाही से धरती फिर आग का गोला बन जाय ।

एक और बड़ी समस्या भूमिगत जल का अन्धाधुन्ध दोहन । मनुष्य लाखों वर्षों से सतही जल (नदी , झरनों और तालाब का) का सेवन (पीनें सहित) करता आया है । फिर उसनें कुएँ खोदे , उसके बाद आया हैण्ड़पम्प । लेकिन आज बड़े-बड़े मोटरों , सबमर्सिबल और मोनोब्लाक पम्प्स से पानी लिफ्ट किया जाता है जिससे पानी का अपव्यय भी होता है । कुओं , हैण्ड़पम्प आदि में मेहनत लगनें के कारण पानी का अपव्यय कम होता था । एक तो वर्षा कम होनें , वृक्षों के कम होनें से भूमिगत जल रिचार्ज में कमी आयी है , दूसरी ओर करोड़ों वर्षों से भूमि के अन्दर संचित जल का अन्धाधुन्ध दोहन समस्या को विकराल रुप देती है ।

हमारी सनानत परम्परा पर्यावरण का सम्मान करती आयी है । फिर चाहे वह वृक्षपूजा हो या नदियों को माता मानना रहा हो । हमनें प्रकृति के हर रूप की पूजा प्रकृति के संरक्षण के उद्देश्य से की है । लेकिन आज पाश्चात्य जगत की भोगवादी संस्कृति का अन्धानुकरण करके अपनी संरक्षणवादी मानसिकता का कहीं न कहीं परित्याग किया है ।

आज जरूरत है वृक्ष लगाये जाँय । खेतों में , मेड़ों पर , घरों के सामने की भूमि , जंगल और पर्वत की जमीनों का अभियान चलाकर वृक्षों से श्रृँगार किया जाय । मल्टीस्टोरी बिल्ड़िंगों में हरित तकनीकि का उपयोग किया जाय । जल का अपव्यय न किया जाय । एअरकंडिशनरों एवं कारों के इस्तेमाल में मितव्ययिता बरती जाय , साइकिलों को बढ़ावा दिया जाय और पालीथीन का कम से कम उपयोग किया जाय । तो अगली बार जब सब्जी खरीदनें जाइएगा तो कपड़े का झोला अवश्य लेकर जाइएगा और सब्जीवाले से सब्जी पालीथीन की थैली में रखकर नहीं सीधे झोले में लीजिएगा । यकीन मानिये साहब फर्क पड़ता है ।

© अनुरोध श्रीवास्तव

prachi
नाम - अनुरोध कुमार श्रीवास्तव " प्रकृति के सुन्दरम का कवि" पिता - श्री अष्टभुजा प्रसाद श्रीवास्तव माता - स्व.श्रीमती सावित्री श्रीवास्तव पत्नी - श्रीमती कुमुद श्रीवास्तव जन्मतिथि - 05/05/1978 शिक्षा - स्नातक जन्मस्थान - महर्षि वशिष्ठ और हिन्दी साहित्य के महान समालोचक तथा साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल , और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पावन भूमि जनपद - बस्ती,उत्तर प्रदेश । लेखनशैली - प्रकृति के सुन्दर दृश्यों को आत्मसात कर अपनें कविता द्वारा पाठक के समक्ष प्रकृति का चित्रण करना मूल काव्य शैली । इसके अतिरिक्त श्रृंगार ,सौन्दर्य ,बाल साहित्य,गौरैया एवं अन्य पक्षी संरक्षण,पर्यावरण संरक्षण नदी एवं जल संरक्षण,स्त्री सशक्तीकरण,हास्यव्यंग्य और सामाजिक सन्दर्भ के विषय । प्रकाशित साहित्य - एक काव्य संग्रह "जिन्दगी के साज पर" दो साझा काव्य संग्रह "काव्य प्रभा" और "अन्त्योदय से आनन्द" तथा एक साझा लघुकथा संग्रह "लम्हे" प्रकाशित । अन्य गतिविधियां - विभिन्न वेब आधारित साहित्यिक मंचों एवं स्वयं के फेसबुक पृष्ठ "Jaan-A-Gazzal " पर सक्रिय रूप से सतत लेखन । मूल विधा छन्दमुक्त कविता । कविता के अतिरिक्त लेख ,हाइकु,गजल,शेर,दोहा,मुक्तक,कहानी एवं लघुकथा लेखन में सक्रिय । सम्मान/पुरस्कार - प्रतिलिपि जैसे प्रतिष्ठित साहित्यिक मंच से "आजाद भारत चैलेंज सम्मान" एवं स्टोरीमिरर प्रतिष्ठित साहित्यिक मंच पर "लिटरेरी कैप्टन" उपाधि , द साहित्य मंच से जुलाई 2020 में "टाप आथर आफ द मंथ" सम्मान प्राप्त । सम्प्रति - ग्राम्य विकास विभाग में कार्यरत । सम्पर्क - anurodh9839668367@gmail.com मोबाइल - 9839668367

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