गलतफहमी

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”मम्मी, आप हमारे साथ बंगलौर चलो… पापा थे तो अलग बात थी। अब आप अकेली यहां गांव में कैसे रहेगी?” बेटे अनिल ने कहा तो मैं असमंजस में पड़ गई। हार्टअटैक से हुई इनकी अचानक मौत से मैं अपने आप को लाख कोशिश के बाद भी संभाल नहीं पा रही थी। बारह दिन हो जाने से सभी मेहमान चले गए थे। बेटा अनिल और बहू अनिता दोनों ही इंजिनियर है। मेरी सहेलियों ने मुझ से कहा कि बेटे-बहू के पास रहने नहीं जाना क्योंकि कमाने वाली बहू को बुजुर्ग सास बिल्कुल अच्छी नहीं लगेगी। उसकी आजादी में तुम्हारे जाने से खलल पडेगी। वो तुम्हें ताने मार मार कर तुम्हारा जीना हराम कर देगी। वैसे भी भाई साहब ने जीते जी ही पूरी संपत्ति बेटे के नाम कर दी थी। ऐसे में तो पूरी संभावना है कि बेटा बहू यहां का मकान बेच कर माल तो सब ले लेंगे और तुम्हें पाई पाई के लिए तरसा देंगे! लेकिन बेटे बहू के साथ जाना मेरी मजबूरी भी थी। 60 की उम्र में अपने घुटनों के दर्द के कारण मैं अपनी किराणा दुकान चलाने में असमर्थ थी। बारह दिन के कार्यक्रम का पूरा खर्चा बेटे ने ही किया। लेकिन छोटे मोटे खर्च के लिए बेटे के आगे हाथ फैलाना मुझे ठीक नहीं लगा और जो थोड़े बहुत पैसे हमने जमा कर रखे थे वे खर्च हो गए। अब हालात ये थे कि मेरे पास सौ रुपए भी नहीं थे। असमंजस में मैं अनिल को कोई जबाब नहीं दे पाई।

इतने में अनिता ने कहा, ”मम्मी जी बताइए कि कौन कौन सी साडियां रखनी है? मैं आपकी सूटकेस पैक कर देती हूं…।” अनिता के ऐसा कहने पर मैं कुछ बोल नहीं पाई और चुपचाप इन लोगों के साथ बंगलौर आ गई।

अनिल और अनिता दोनों ही मेरा पूरा पूरा ख्याल रखते। सभी साथ ही में खाना खाते। अनिता मेरी पसंद के हिसाब से खाना बना देती। दोनों की यहीं कोशिश रहती कि मुझे इनकी याद न सताएं…मैं खुश रहूं…आठ साल का पोता चींटू तो दादी माँ…दादी माँ कह कर मेरे आगे पिछे घुमते रहता। मैं कोई भी चीज के लिए बोलती तो वो चीज मुझे बराबर ला कर दे देते। ये सब देख कर मेरे मन को बहुत शांति मिल रहीं थी। मैं सोचने लगी कि लोग बेवजह ही आजकल के बच्चों को बदनाम करते है कि वे लोग बुजुर्ग माँ बाप की कद्र नहीं करते। खास कर यदि बहू कमाने वाली हो तो वो सास को नौकरानी ही समझने लगती है। अनिता भी तो कमाती है लेकिन कितने अच्छे से घर और दफ्तर दोनों संभालती है। कभी कोई ताना नहीं मारती। वो तो मुझे ही लगता है कि वो ऑफ़िस और घर दोनों जगह का काम कर थक जाती होगी इसलिए मैं ही थोड़ा-बहुत काम कर लेती हूं। लेकिन बेटा बहू दोनों ने कभी भी मुझे किसी काम के लिए नहीं कहा। एक महीना कैसे बीत गया पता ही नहीं चला।

आज सबने बाहर घुमने का कार्यक्रम बनाया। मॉल में घुमते घुमते अनिल और अनिता एक दुकान से कुछ खरेदी करने लगे। मैं और चींटू थोड़ा आगे निकल गए। आइसक्रिम की दुकान पर चींटू ने कहा, ”दादी माँ मुझे आइसक्रीम खानी है।” मेरे उपर तो मानों बिजली गिर गई! क्योंकि मेरे पास तो पैसे थे ही नहीं! इतने दिनों में पैसों की कोई जरुरत महसूस भी नहीं हुई थी। अब क्या करू? मेरा उतरा हुआ चेहरा देख कर चींटू ने फ़िर कहा, ”दादी माँ, प्लीज ले दीजिए न!”

”सॉरी बेटा…मैं अपना पर्स घर में ही भूल गई!” मेरे ऐसा कहने पर चींटू ने मेरी तरफ़ कुछ अजीब नजरों से देखा। उसे लगा कि आइसक्रीम न दिलाना पड़े इसलिए मैं बहाना मार रही हूं। लेकिन मैं कर भी क्या सकती थी? मुझे अपनी बेबसी पर रोना आने लगा। मैं कैसी दादी हूं कि अपने पोते को आइसक्रीम भी नहीं दिला सकती? इनके जाने के बाद पहली बार मैं अपने आप को बहुत ही असहाय महसूस कर रही थी। हमने बाहर डिनर किया। अनिता ने मेरे पसंद की काजू करी ऑर्डर की थी। लेकिन मुझे उसमें भी स्वाद नहीं आ रहा था।

घर आने पर थोड़ी देर सभी ने टीवी देखी। अनिल सोने चला गया और अनिता चींटू के कमरे में गई ताकि मच्छर की टीकिया लगाकर उसे ब्लैंकेट आदि देकर सुला दे। मैं भी अपने कमरे में सोने जाने लगी। इतने में मुझे चींटू की आवाज सुनाई दी, ”मम्मी, दादी माँ बहुत ही कंजूस है!”

”तू ऐसे कैसे बोल रहा है?”

”हां, मम्मी! आज मॉल में घुमते वक्त मैं ने दादी माँ को आइसक्रीम दिलाने कहा तो उन्होंने कहा कि वे अपना पर्स घर में ही भूल आई है। कितना अच्छा है न मम्मी कि बाहर जाओ तो पर्स ही साथ में न ले जाओ तो कुछ खर्चा ही नहीं होगा! कंजुस दादी माँ!!”

”ये क्या है चींटू? दादी माँ के लिए ऐसा बोलते वक्त तुम्हें जरा भी बिचार नहीं आया? क्या तुम उनके दुख को समझ सकते हो कि वो फिलहाल कितने दुख में है?”

”दादी माँ को क्या दुख है?”

”बेटा, अभी तक दादी माँ और दादा जी गांव में एक साथ रहते थे। अब अचानक दादा जी हम सबको छोड़ कर चले गए। जिस व्यक्ति के साथ हम चौबिसों घंटे रहते है…साथ में उठते बैठते है…साथ में खाना खाते है…अपना दुख सुख शेयर करते है…वो ही व्यक्ति अचानक हमसे बहुत दूर चला जाता है, तो कितन दुख होता है ये अभी तुम नहीं समझ सकते! सोचो, अचानक तुम्हारे मम्मी-पापा तुम से बहुत दुर चले जाएं इतनी दुर कि कभी वापस न आए, तो क्या तुम्हें दुख नहीं होगा?”

”नहीं मम्मी, मैं आप लोगों के बिना नहीं रह सकता!”

”बेटा, फ़िर सोचो दादी माँ दादा जी के बिना कैसे रह रही होगी! ऐसी स्थिति में यदि वो अपना पर्स घर में भूल गई तो तुमने उन्हें कंजूस तक कह दिया? तुम्हें तुम्हारे प्रति उनका प्यार नहीं दिखा? जब भी तुम्हें स्कूल से आने में पांच-दस मिनट की भी देरी हो जाती है, तो वो लगातार बाल्कनी में खड़े होकर तुम्हारा रास्ता देखती रहती है। उस दिन उनके घुटनों में बहुत दर्द होने के बावजूद तुम्हारे कहने पर उन्होंने तुम्हारी मनपसंद मेथी मटर मलाई बनाई थी। इसलिए बेटा किसी के लिए कोई भी राय बनाने से पहले उस व्यक्ति के दृष्टिकोन से भी सोचना चाहिए।”

”सॉरी मम्मी!”

ये वार्तालाप सून कर मुझे अपनी बहू पर बहुत गर्व हुआ। उसकी जगह यदि मैं होती तो शायद मैं भी अपने बेटे को इतने अच्छे से नहीं समझा पाती! सुबह अनिल ऑफिस चला गया और चींटू स्कूल। अनिता ऑफिस जाते जाते मेरे हाथ में कुछ रुपए देने लगी।

”ये क्यों बहू? मुझे पैसों का क्या काम है?”

”मम्मी जी, इंसान को पैसों का कब काम पड़ जाए कह नहीं सकते। आप मंदिर जाती है…कभी दक्षिणा चढ़ा दीजिए। कभी चींटू के कोई चीज के लिए जिद करने पर उसे वो चीज लेकर दे दीजिए।”

”लेकिन बहू…”

”मम्मी जी, यदि यह पैसे अनिल आपको देते तो क्या आप मना करती? नहीं न! आपकी बहू भी कमाती है, तो फ़िर आप अपनी बहू से पैसे क्यों नहीं ले सकती?”

अनिता की बाते सुन कर खुशी के मारे मेरी आंखों में पानी आ गया। जो बात मेरा बेटा भी समझ न सका वो बात मेरी बहू ने समझ ली थी। मैं ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि मेरे जैसी बहू वो सबको दे। लोग बेवजह ही कुछ कमाने वाली बहुओं के दुर्व्यवहार को देख कर सभी कमाने वाली बहुओं पर लांछन लगाते है कि वे तुनकमिजाज और घमंडी होती है…सास-ससुर उनको बिल्कुल अच्छे नहीं लगते आदि। कुछ बहुएं अनिता जैसी समझदार, सुलझे विचारों वाली, बडों का सम्मान करने वाली भी होती है। आज अनिता ने कमाने वाली बहू के बारे में मेरी आंखों पर पड़ा पर्दा हटा दिया था।

मैं तुमसर, महाराष्ट्र की रहनेवाली हूं। मैं खुशियां बांटना चाहती हूं...चाहे वह छोटी-छोटी ही क्यों न हो! मैं ने 'आपकी सहेली' नाम से एक ब्लॉग बनाया है। मैं इस ब्लॉग के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधश्रद्धा दूर करने का, समाज में जागरुकता फैलाने का, किचन टिप्स और रेसिपीज के माध्यम से इंसान का जीवन सरल बनाने के कार्य में लगी हू। • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां प्रकाशित। • IBlogger ने मुझे Blogger of the year 2019 चुना था।

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