सारे अरमान मचल उठे…

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आयी है रुख़ पर बहार
कि चराग-ए-शाम जल उठे
मैखाने में उनकी मस्ती से
शराब-ओ-जाम पिघल उठे
कैसी है ये फिज़ा दिल के
सारे अरमान मचल उठे
देख कर ऐसी शोखी-ए-जनाब
हर जानिब दिल में कभी
रुबाई उठे तो कभी गज़ल उठे

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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