प्रेम ( मंजूर के दोहे )

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प्रेम
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( दोहा )
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१)
प्रेम की बंसी सुमधुर,मंत्रमुग्ध करी जाए।
सुध-बुध का न पता चले,एकांत समय बिताए।।

२)
जीवन में प्रेम महान, कुछ न इसके समान।
मान सम्मान जहां मिले,वही है स्वर्ग स्थान।।

३)
नमन से नयन मिलाओ, आंखें कर लो चार।
प्रेमरोग में जो पड़े,छुट जावे संसार ।।

४)
प्रेम सरीखा रोग ना,सब रोगों का बाप।
लगते कुछ सूझत नहीं, मानों हो अभिशाप।।

५)
मां का प्रेम है सोना,जाने जग संसार।
‘मंजूर’ सेवा करना, दुआ लेना हजार।।

लेखक- मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर
सलेमपुर, छपरा, बिहार।

prachi
मैं मो. मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर। जन्म 01 मार्च, 1978 को बिहार के छपरा, सारण मे हुआ है। वर्तमान में राजकीय मध्य विद्यालय, भलुआ शंकरडीह, तरैया, सारण में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत। पिता राहत हुसैन और माता स्व.अनवरी बेगम। एम.ए., एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त और बेसिक शिक्षक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। आप मुझसे फोन द्वारा 9430011043, 7979928713 और ई-मेल mzr1978@gmail.com पर संपर्क कर सकते है। आपको मेरी कविताएं अच्छी लगी हैं तो पिछले दिनों प्रकाशित मेरा काव्य संग्रह पढ़ सकते हैं-

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