उफ़ तौबा…

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वो उनके बेखौफ़ अन्दाज़
जो जज़्बातों से हारे उफ़ तौबा
सन्नाटों से ये लब चुप थे पर
नज़रों से इशारे उफ़ तौबा

जब भी देखें उनको तो
हम उनमें गुम हो जाते हैं
थम जाते हैं कदम जहाँ
वो हमें पुकारे उफ़ तौबा

अब तो आईने से भी
हमे झिझक सी होने लगी
देखें उन्हें सिर्फ सोचें उन्हें
हर सू उनके नज़ारे उफ़ तौबा

जहाँ जहाँ तुम्हारा नाम आया
हर शै को तुम्हारे नाम किया
अब तो खुद को हम खोने लगे
जब से हुए तुम्हारे उफ़ तौबा

काश कि हम उन्हें बुलाते
काश कि वो बस आ जाते
दिल से जुड़ा ये रिश्ता और
हम तुम पर दिल हारे उफ़ तौबा

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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