एक इनायत है उनकी…

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यूँ तो कोई आवाज़ नहीं मगर
ध्यान हमेशा दरवाज़े पर ।
पत्ता भी हिले तो लगे है यूँ
कदमों की आहट है उनकी। ।

साथ छूटा पर याद नहीं
हमदम मेरी और दुश्मन भी है ।
अब तलक़ इस वीराने दिल में
एक बस चाहत है उनकी ।।

एतबार खुदा का क्या करें
साथ उनका मयस्सर हो ना सका
मुहब्बत के सदके में झुके है सर
और एक इबादत है उनकी ।।

मुश्किल ये भी नहीं उनको
कि राज़-ए-दिल न कह सके ।
हर एक बात पर अब तलक
रूठने की आदत है उनकी। ।

दिल मेरा क्या जाँ मेरी
देकर उनको भी मैं अब क्या दूँ
हर एक शै का ये आलम है
बस एक इनायत है उनकी।।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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