कुछ अनकहा सा…

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सब कुछ तुमसे कह कर
कर चुकी मैं हल्का जी को
पर अब है कुछ अनकहा सा
बस तुमसे राज़दां के लिए

एक तुमसे वस्ल की ख्वाहिश
हर दुआ-ओ-मन्नत मेरी कि
काश! मैं हो जाऊं मुक्कमल
अपनी अधूरी दास्ताँ के लिए

कुछ यूँ भी है कि तुम तक
हर राह गुज़र तुमसे गुज़रे
एक हमसफ़र तुमसा उस
तुम्हारी गो आस्तां के लिए

हर एक हर्फ़ मेरा तुम हो
हर लफ्ज़ की शक्ल में तुम
बस एक सहारा मेरे लबों को
मेरी कांपती हुई जुबां के लिए

जानती हूँ मैं कि तुम अब
मुझसे कुछ नज़दीक से हो
काफी है बस तुम्हारी धड़कन
मुझ जैसी गुमशुदा के लिए

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

2 COMMENTS

  1. बहुत सुन्दर और बहुत अच्छी गजल | शुभ कामनाएं |

  2. आभार आदरणीय काफी व्यस्त दिनो के बाद मेरा प्रयास सफल रहा।

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