कोई हमारा चाहिए।

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दो राहे से थकने लगे
फिर से कदम कमज़ोर हुए।
इन लड़खड़ाते कदमों को
अब फिर से सहारा चाहिए। ।

दूसरों की खातिर हंस हंस के
जकड़न सी लबों पे लगे है अब।
कहते हैं दिन रात ये लब
अब फिर जहान सारा चाहिए।

रिश्ते पहचानने में दिल
नाकामयाब फ़िर से हुआ।
टूटा दिल फ़िर से बहल सके
अब वो एक इशारा चाहिए। ।

सूने से दिन रातों का
सम्भलना अब दुश्वार हुआ।
उम्मीद फ़िर से एक शाने की
अब फ़िर बाहें दोबारा चाहिए। ।

सच कहूँ तो हर सू एक
घुटन सी काबिज़ होने लगी।
हर शै से कहते हैं बस कि
अब हमें कोई हमारा चाहिए। ।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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