क्यों डर सा मुझको लगता है…

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रहते हो तुम गुमसुम से
क्यों डर सा मुझको लगता है
रहते हो दूर तुम हमसे
क्यों डर सा मुझको लगता है

एक सबब ही बतला दो
मुझसे ख़ता क्या हो गयी
बोझिल हो तुम किस गम से
क्यों डर सा मुझको लगता है

पास तुम्हारे रहकर भी
क्यों तुम मेरे साथ नहीं
आंखों में आंसू सावन से
क्यों डर सा मुझको लगता है

कह कर देखो मुझसे तुम
हर गम को सह जाऊँगी
अन्जाने हुए तुम एकदम से
क्यों डर सा मुझको लगता है

इस तरह जी ना पाऊँगी
डरती हूँ इस खामोशी से
कैसे कहुँ मैं ये अब तुम से
क्यों डर सा मुझको लगता है

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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