ज़िन्दगी जंगल कर ली हमने…

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हम उन्हें सोचा किये
वो हमीं पर हंसते रहे
अपनी तकदीर उनसे
कुछ बदल कर ली हमने

कुछ उनकी तसल्ली को
हर पल आंखे खुली रही
उनके सिरहाने बैठ अपनी
रातें क़त्ल कर ली हमने

टूटे पत्तों जैसे यूँ ही
हम शाख को तकते रहे
उनके लिए ज़िन्दगी अपनी
पूरी जंगल कर ली हमने

जब भी उठाया हाथ तो
बस उनके लिए मांगा
न चाहते भी बदकिस्मती में
खुद अपनी दख़ल कर ली हमने

पलकों से उठाए कांटे
बिछाए गुल उनकी राहों में
अपनी राहें सूखी बंजर या
बस दल-दल कर ली हमने

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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