तुम्हारी ख़ातिर………

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जब भी देखूँ पीछे मुड़कर
दिल कितना ही रोया होगा ।
एक तुम्हारी ख़ातिर हमने
कितना ही कुछ खोया होगा। ।

लफ़्ज़ों के परे सफ़र में
जाने कितने जज़्बात लिए।
बिन आखों के दिल मेरा
न जाने कैसे सोया होगा। ।

कुछ दोष ये था मेरा कि
सब कुछ उनके नाम किया।
अपनी सरपरस्ती को कैसे
तिनका तिनका संजोया होगा।

कुछ सांसों में गीलापन
कुछ बातों में गहराई ।
इन आंखों ने दामन मेरा
बिन सावन ही भिगोया होगा।

तुम पर इतना ही बस था कि
तुमसे कुछ ना कह पायी मैं ।
बस नाम तुम्हारा लेने को
लफ्ज़ दर लफ्ज़ पिरोया होगा।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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