बस मैं तुम्हारे संग…

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मेरे संग तुम शाम-ओ-सहर
शाम ढली कुछ मद्धम मद्धम
जैसे बेखौफ़ रात -ओ- किरण
वैसे  बस  मैं  तुम्हारे  संग ।।

एक नाम तुम्हारा आते ही
बस सर झुके है सजदे में।
जैसे कि वो दुआ-ओ-दामन
वैसे बस मैं तुम्हारे संग ।।

एक तुमसे हम क्या मिले
कि तुम ज़रूरत बनते गए।
जैसे कि एक जिस्म-ओ-घड़कन
वैसे बस मैं तुम्हारे संग ।।

हर पल है ये बैचैनी क्यों
तुम पर मुनस्सिर होने लगी ।
जैसे कि बारिश-ओ-चमन
वैसे बस मैं तुम्हारे संग ।।

एक तुम्हारे आते ही फिर
सुरूर सा मुझ पर छाने लगा ।
जैसे कि मेहन्दी -ओ-दुल्हन
वैसे बस मैं तुम्हारे संग ।।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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