याद है मुझे…

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याद है मुझे वो अब तलक़
अन्दाज़ किसी के आने का
ख्वाबों से जगा कर नीन्दों में
चुपके से चले जाने का

याद है छुअन वो हाथों की
सांसों की खुशबू सांसों में
यही सबब था आईने में
देख कर मेरे शर्माने का

याद है पहला पैगाम उनका
वो ख़त भी वो आदाब भी
मुझे देखने के वास्ते रुकना
आगाज़ किसी बहाने का

याद है एक एक लफ्ज़ उनका
आवाज़ अब तलक कानों में
करना बातें किसी और से
गरज़ से मुझे सुनाने का

याद है मुझे वो हर सौग़ात
जो वज़ह है मुझे रुलाने की
वो ताज़ है निगाहों में सिर्फ
जो अब हिस्सा है वीराने का

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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