अंतर क्यो

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पुरूष की तरह ही होता है, नारी के भी कोमल मन का भाव.

देती है विरह पीड़ा उसे भी,  बस अभिव्यक्ति का रहे सदा अभाव.

चाहता है आलिंगन उसका तन भी,  शर्म रोकती है उसके अक्सर पांव.

देखती हैं उसकी नजरे पिया को अक्सर, और पिया से बढ़ता हुआ लगाव.

पुरूष सहजता मे कह देता,  नारी से अपने तन मन के हर भाव.

नारी चाहे जब भी कहना कुछ भी,  चार लोगो का उसके मन में तनाव.

नर की बाते भी तन छू जाती,  नारी के मन को भी करना पड़ता खुद कि इच्छा से भटकाव.

एक तरफ सामान हुए हैं दोनों,  दूसरी तरफ बस विवशता का फैलाव.

तन की भूख सुख की आस, ये तो है बस प्रकृति का अमिट स्वभाव.

पुरूष की तृष्णा है पाकीज़ा फिर क्यों,  जब नारी की लगे अलाव.

एक ही इच्छा से बंधे जब जीवन,  फिर नारी के ही चरित्र पर क्या घाव.

क्यो वो गर कह दे अपने मन की,  उसके तन का लग जाए जंहा में दाव

स्वरचित ©द्वारा सीमा शुक्ला चाँद

I am an assistant professor in higher education department of Madhya Pradesh. I am serving in English Dept. My research is going on in English. I pursued three pg in (ENGLISH, HINDI, AND SOCIOLOGY) I am also Law graduate. I did B.ed. I am Hindu by caste and differently able by physic. I am fond of writing my observations. I love to wonder here and there without thinking about anyone. I love listening music

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