आशिक़ी में भी हिसाब किताब…🙏🙏

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अर्ज़ किया है…

आशिक़ी के नाम से दिल क्यों पत्थर हो जाता है,

केवल इसकी सोच से ही मस्तिष्क गुमराह हो जाता है,

नाम कोई इसका जो प्रत्यक्ष लेदे,रूह के लिए आलम असहज हो जाता है,

लगता है आशिक़ी हद के पार ही रही होगी,

क्योंकि यह इल्म में नहीं था की आशिक़ी में भी थोड़ा बहुत हिसाब रखना होता है।।

I consider myself as a budding writer and participated in ANUBHUTI, ANAMIK, MERI ZUBAANI anthologies

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