उनको तय करने लगी हूँ…

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ख्याल उनका और बातें उनकी
उनका दिन और रातें उनकी
ऐसा लगता है मैं उनकी होकर उनको कुछ तय करने लगी हूँ

राहों से उनके कदम हटे तो
मेरी हर सोच में रह गये वो
उनसे सीखी गुज़ारिशें सब
कुछ मै उनसे करने लगी हूँ

उनके सवाल पर सर झुकाना
उनकी बात से दिल बहलाना
सच कहुँ तो मै मैं हूँ मगर
खुद से खुद पर इतरने लगी हूँ

उनको काबू में करने की ज़िद
पर उनके बस में हो गई मैं
ख़ुद को उनके संग देखकर
अनचाहे बनने संवरने लगी हूँ

कुछ सुलझी कुछ अनसुलझी
मैं जैसे कि गिरहें धागों की
जितना वो मुझको समेटे मैं
पल पल उतनी बिखरने लगी हूँ

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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