उम्र के इस पड़ाव पर…

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उम्र के इस पड़ाव पर
फिर कुछ करना सीख रही हूँ
गिरना उठना रुकना चलना
लड़खड़ाना सम्भलनासीख रही हूँ

आंखों के आँसू गालों से चखना
खुद को सबसे ऊपर रखना
ज़िद झगडों से बातें करना
फिर कुछ करना सीख रही हूँ

क ख ग पर फिर तुतलाना
चन्दा पानी में नहलाना
परछाई पैरों तले कुचलना
फिर कुछ करना सीख रही हूँ

कश्ती सागर में तैराना
सपने अम्बर में लहराना
जुगनू मुट्ठी में जकड़ना
फिर कुछ करना सीख रही हूँ

दुनिया रख पैरों के नीचे
अनचाहे ही पलकें मीचे
सौ शब्दों में बातें समझाना
फिर कुछ करना सीख रही हूँ

तारे छूने को मचलना
तितली हाथों से पकड़ना
पूरी दुनिया सिर पर उठाना
फिर कुछ करना सीख रही हूँ

गुड्डे-गुड़िया का ब्याह रचाना
पूरे घर भर में इतराना
बिना बात के रौब झाड़ना
फिर लड़ना झगड़ना सीख रही हूँ

फिर कुछ करना सीख रही हूँ
उम्र के इस पड़ाव पर …….
(एक दादी के अनुभव से)

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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