एक खत

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एक खत के इंतजार मे बीतते थे वो दिन,

जो रिस्तो के साथ दिलों को जोडता था,

एक खत के इंतजार मे तरसते थे वो दिन,

जो खुशियों की फुहार ले आता था।

अध्यायों में भी खत पत्रों में जुड़ गया,

कभी आफीसियल तो अन-आफीसियल हो गया,

रिस्तों में भी सब कनफ्यूशियल हो गया,

एक खत इन्टरनेट से जुड़ गया।

एक खत ने कहानियांँ  लिख दि,

कभी हमारी तो कभी तुम्हारी लिख दि,

लेखनी ने देखों फिर एक कहानी लिख दि,

कभी स्वैच्छिक तो कभी कविता लिख दि।

एक खत माध्यम बन गया,

हमारे – तुम्हारे रिश्ते का अफसाना बन गया,

सुख-दुख को साझां कर गया,

परायों से अपना बन गया।

एक खत ने रुप अनेकों लिए,

कभी तारीफें लिख दिए,

कभी एहसास लिख दिए,

एक खत ने जीवन के एहसास लिख दिए।

 

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डा. वन्दना खण्डूड़ी

देहरादून, उत्तराखंड

स्वरचित रचना

मैं डा. वन्दना खण्डूड़ी, देहरादून, उत्तराखंड से हूँ। मै बायलोजी की प्रवक्ता हूँ, मेरा साहित्य की ओर रुझान है। मुझे कविता ,कहानी तथा अनेक प्रकार की रचनाओं को सीखना अच्छा लगता है, खासकर मेरा रुझान साकारात्मकता की ओर होता हैं। नाकारात्मकता से मुझे परहेज है।

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