कब तलक चलते रहोगे

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कब तलक चलते रहोगे,

इन गुमनाम गलियों मे,

न सहारा मिलेगा,

इन राहों में,

जीवन के फलसफों को,

रखना साथ हमेशा,

गुमनामी के अंधेरे को न बताना,

किसी से।

कब तलक चलते रहोगे,

यूं गमगीन यादों में,

जरा फलसफों के गमों की यादों में,

चादर तो बिछाना,

खुशियों के दीप प्रज्वलित करके,

फलसफों की यादों से,

थोडा खुशियों को,

लेकर आना।

कब तलक चलते रहोगे,

अपने अहम मे,

जरा अपनी कमीयों ,

को भी निहारना,

अपनो से कैसे गिले-सिकवे,

सभी गमों को भूलाकर,

एक कदम,

आगे तो बढना।

कब तलक चलते रहोगे,

यूं ही,

सिमटे–सिमटे,

अपने मे,

जरा गमगीन,

माहौल से हटकर,

थोडा खुशियों,

को समेटना।

कब तलक चलते रहोगे,

जीवन के कंटीले,

पथ पर,

कंटीले पथ से,

जरा गुलाब तो लाना,

गुलाब की महक से,

जरा जीवन को,

खुशनुमा तो बनाना।

 

 

डा. वन्दना खण्डूडी

देहरादून,उत्तराखंड

स्वरचित रचना

मैं डा. वन्दना खण्डूड़ी, देहरादून, उत्तराखंड से हूँ। मै बायलोजी की प्रवक्ता हूँ, मेरा साहित्य की ओर रुझान है। मुझे कविता ,कहानी तथा अनेक प्रकार की रचनाओं को सीखना अच्छा लगता है, खासकर मेरा रुझान साकारात्मकता की ओर होता हैं। नाकारात्मकता से मुझे परहेज है।

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