घात पीछे से करने लगे

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घात पीछे से करने लगे

 

बेरहम है यह दुनियाँ संभल कर चलो ,

घात पीछे से करने लगे हैं यहां |

हर कदम पर है धोखा संभल कर चलो,

हाथ मलकर पीछे पड़े हैं यहां ||

 

बात ही बात में झगड़े होने लगे ,

साथ में बैठना भी असंभव हुआ |

जो पड़ोसी भी था वह दुश्मन है अब,

इधर खाई है और उधर है कुआं |

भाई भाई भी दुश्मन अब बन गए,

खून आपस में पीने लगे हैं यहां |

घात पीछे से करने लगे हैं यहां ||

 

जितनी गर्मी है सहनशक्ति उतनी नहीं,

जोश में होश खोने वाले हैं सब |

हंसते हंसते ही गुस्सा उबल जाता है ,

विनाश के बीज बोने वाले हैं सब |

क्या रिश्ता निभाया ना समझ पाओगे ,

सारे रिश्ते भी खोने लगे हैं यहां |

घात पीछे से करने लगे हैं यहां ||

 

यूं ही लड़ते रहे तो झुलस जाओगे ,

आग ईर्ष्या की सबसे बड़ी आग है |

ना संभल पाए हो तो संभल जाओ तुम ,

यह जीवन तो पानी का एक झाग है |

प्रेम ही जिंदगी का अटल सत्य है ,

दुश्मन तो मरने लगे हैं यहां |

घात पीछे से करने लगे हैं यहां ||

लक्ष्मण सिंह त्यागी ‘ रीतेश ‘

लेखक, कवि और संपादक। मैं आज तक दर्जनों पुस्तकों का सफल संपादन कर चुका हूँ और मेरी लगभग 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं है व कुछ प्रकाशनाधीन हैं।

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