चार दिन का मेला

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क्या लेके आया है?
क्या लेके जाएगा?
चार दिन की जिंदगी।
चार दिन का मेला है।
एक दिन बीता सीखने में
दूजा दिन कुछ काम में ।
तीजे में कुछ न कर पाया
चौथा दिन रहे पछताय।
अब पछताए हो क्या?
जब यह जीवन गवांया।
जीवन की पूंजी खोई।
मोह- माया के फेर में ।
खाली हाथ आया है
खाली हाथ जाएगा।
राम नाम सुमिरन से
जीवन पार पायेगा।
चौसठ योनियों में
यह जीवन अनमोल।
एक एक सांस का
हम जो मोल डाल लें
सांस जो आ रही
उसको संभाल ले।
जीवन मिला है जिसके लिए
वह काम कर ले
ईश्वर अल्हा तक यही
बात और सौगात जाएगी।
मुक्ति इसी काम में रवि
अब तुम पायेगा।
जीवन अमर कर पाएगा।

सर्वाधिकार सुरक्षित है।

©®रवि शंकर साह देवघर झारखंड

prachi

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