जननी

वो नही जनना चाहती थी एक लड़की,

इसलिए नही की समाज परिवार में
उसका मान घट जाता,
बल्कि इसलिए कि लड़कियों
के लिए आज़ाद दुनिया का
पर्दा लिए ये नकाबपोश दुनिया मे,
उसकी ही तरह एक और लड़की
का पर कट जाता,
वो नही जनना चाहती थी एक लड़की,
वो नही चाहती थी
जैसे उसने बिना शरीर छुए
सिर्फ नज़रों की नग्नता को
अपनी देह पर महसूस किया है,
उससे जनी उसकी कली भी महसूस करे,
वो नही चाहती थी
जैसे उसने समाज परिवार का मुँह देख कर
अपना मुंह बंद कर लिया
उसकी बेटी भी बंद कर ले
माना वो सक्षम हो जाती,
उड़ बेटी मैं हूँ तेरे साथ ये कह पाती
पर जीवन मे परिस्थितियों को कहां तक रोक पाती
पितृसत्तात्मक चलती आ रही पीढ़ियों
में कभी न कभी तो कोई बाधा आ ही जाती,
जहां वो स्त्री है ये स्थिति बता ही जाती,
वो जनना नही चाहती एक और जननी।।
सुप्रिया “रानू”
लेखन मेरे लिए अभिव्यक्ति है भावों का जो शब्दों का रूप लेकर एक मूर्त रूप में प्रस्तुत होता है। काव्य मेरे लेखन की प्राथमिक और सहज विधा है, निबंध, कहानी, लघुकथा, छंदबद्ध कविता हाइकु आदि विधाओं में निरंतर प्रयास जारी है। प्रकाशित साझा काव्य संग्रह "अनुभूति", "अनामिका", "कस्तूरी सुगंध" रही हैं और संपादकीय स्तर पर "काव्य मंजरी" प्रकाशनाधीन है।

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