ज़िन्दगी है ये इसको जिया कीजिये…

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सोचकर खुश रहें कि आज हाथ में है क्या
जो रहा नहीं न उसका गिला कीजिए।
बीती रातों और बातों को नया
मोड़ दें।
फिर एक नयी ज़िन्दगी से मिला
कीजिए। ।

ख़ाक और ख़ास में फर्क है बस यही।
या तो भूल जाइए या तो पा
लीजिये।
कल तलक़ जो उम्मीदें रही बेहद
उनके आगे बस बेशक़ लगा
दीजिए। ।

ये नहीं वो नहीं हम क्यों सोचें
यही।
दोष किस्मत को फ़िर क्यों दिया
कीजिए
गर ये चाहें तमन्नाएं तकदीर हो
फैंसले खुद के खुद ही बस लिया
कीजिए। ।

कुछ नहीं तो भी कुछ न कुछ किया कीजिये।
जिन्दगी है ये इसको जिया
कीजिए।
ये खालिश तो रहेंगी अब उम्र भर
यूँ ही।
संग जो है पल बस उसका मज़ा
लीजिये। ।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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