पुनः…

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धवल चाँदनी की मनुहार
फिर कुछ सूरज से लें उधार
चलो बन जाएँ हम तूलिका
कर लें प्रकृति का श्रृंगार पुनः

अम्बर को धरती पर ले लाएं
चलिए नया एक क्षितिज बनाएं
फिर मयूर का स्वागत नर्तन
और मेघों का मल्हार पुनः

वो नदियों का इठलाना और
तितली का सौ रंग चुराना
वो आसमान का इन्द्रधनुष
और एक स्वपनिला संसार पुनः

घर घर में चंदन महकाएं
रंगोली से हर द्वार सजाएं
करके कण कण की आराधना
दें हम सृष्टि को उपहार पुनः

पर्वतों को दें फिर से हरियाली
हर अमावस हो पूनम वाली
सुमन माल कृतज्ञ भाल लिए
करें सभी प्रकृति का आभार पुनः

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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