फूल खिलने लगे

0
21

फूल खिलने लगे

 

किसके अक्स को याद करें

और किसे भुला दें हम बोलो |

किस दरिया में घर बनवा लें

किस गुल को उजाड़ दें हम बोलो |

किसको कौन है कितना भाता

पता नहीं चल पाया है,

किसको सीने में सुला लें

दिल से किसे निकाल दें हम बोलो ||

 

फूल खिलने लगे फूल से खिल गए |

जैसे बिछड़े हुए पंछी मिल गए ||

जो भी सोचा था मैंने कभी ख्वाब में |

वही मिलने लगा है अब हमें जवाब में |

दूर जाना भला अच्छा होता नहीं ,

फिर क्यों छिप रहे हो तुम आजकल नकाब में |

प्रेम में आए थे प्रेम में जाएंगे ,

अभी तो कुछ ना गया बस दो दिल गए ||

 

खेल ही खेल में खेल होता रहा |

दो दिलों का मिलन मेल होता रहा |

प्रेम की रात का इंतजार है मुझे ,

पेपर ऐसा ही था मैं फेल होता रहा |

सीधे-साधे तरीके से तुम पूछ लो ,

तेरे तेवर हैं ऐसे कि हम हिल गए ||

लक्ष्मण सिंह त्यागी ‘रीतेश’

 

लेखक, कवि और संपादक। मैं आज तक दर्जनों पुस्तकों का सफल संपादन कर चुका हूँ और मेरी लगभग 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं है व कुछ प्रकाशनाधीन हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here