बरसात

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बरसात

 

बिटिया की शादी का रखा सामान लेने आई है

ये बारिश फिर किसी का इम्तिहान लेने आई है

 

पेट काटकर पेट पालना कितना मुश्किल होता है

ये बारिश फिर किसी भूखे का ईमान लेने आई है

 

फुटपाथ पर ही सो गया आसमां को छत समझकर

ये बारिश फिर किसी आम का मकान लेने आई है

 

अपनों से मिलने के लिए कोई है सपने बेच रहा

ये बारिश किसी मोहताज की दुकान लेने आई है

 

मेरे आंसू जब रुके नहीं तो मैं बारिश में भींग गया

ये बारिश फिर से इस बार मेरे अरमान लेने आई है

 

लक्ष्मण सिंह त्यागी रीतेश

लेखक, कवि और संपादक। मैं आज तक दर्जनों पुस्तकों का सफल संपादन कर चुका हूँ और मेरी लगभग 12 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं है व कुछ प्रकाशनाधीन हैं।

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