मेरी तन्हाई

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मैं भी कभी तन्हा ना रहुं “साथी”,
ये मेरी रब से थी हमेशां ही दुआ।
तेरे जैसा हम सफर हो काश,
यह तलाश का सफर खत्म हुआ।।
तेरी महफ़िल में शायद ज़िंदगी नसीब हों।
तूं मिल जाए तेरी सासें भी करीब हों।।
जी लुं ज़िन्दगी तेरे पहलु में एक बार।
फिर यह तन मन हो जाए चाहे धुआं ।
घुट घुट कर मरने का अब सफर खत्म हुआ।।
बस एक पल तेरी बाहों में और गूजार लुं।
जीवन की कुछ सांसें चाहे रब से उधार लुं।।
जी भर कर सनम तुझे एक बार निहार लुं।
तन मन कर समर्पित तुझे सुन्दर उपहार दूं।।
जो सपना संजोया शायद आज पूरा हुआ।
राह तकती इन आंखों को आज तेरा दीदार हुआ।।
तेरी बाहों में शायद मेरी तकदीर मिल जाए।
यौवन काल के पुष्प पुन:पल्लवित हो जाए।।
पुरानी प्रित की एक कहानी जीवित हो जाए।
हम मिलें एक दूजे की बाहों में खो जाएं।।
तुम ही हो जिसनें मेरे अन्तर मन को छूआ।

दर दर भटकने का अब सफ़र खत्म हुआ।।

✍🏻कवयित्री:-
प्रिया गुप्ता,दार्जिलिंग
वेस्ट,बंगाल।
🙏🏻🙏🏻🌹🌹👍🏻👍🏻

prachi

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