मैं अल्हड़……….

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कुछ तितली से रंग बटोरूँ
जुगनु अपने हाथों में ले लूँ।
मैं अल्हड़ भी ना क्या क्या सोचूं
कण कण को संजो दूं तेरे संग। ।

हर एक बादल पर फिसलूं
और फिर इन्द्रधनुष बिखेरूं।
मैं अल्हड़ भी ना क्या क्या सोचूं
कुछ ख़्वाब मैं देखूँ तेरे संग ।।

फूलों से सारा घर महका दूं
तारों से गलियां चमका दूं।
मैं अल्हड़ भी ना क्या क्या सोचूं
आंगन में चांद उकेरूं तेरे संग।

बाहों में पर्वत को ढक लूँ
आखों से बारिश को चख लूँ।
मैं अल्हड़ भी ना क्या क्या सोचूं
क्या क्या मैं समेटूं तेरे संग। ।

बंद मुट्ठी में रेत को जकडूं
उड़ जाऊं गगन में हवा को पकडूं
मैं अल्हड़ भी ना क्या क्या सोचूं
दुनिया दामन में भर लूँ तेरे संग।

कवयित्री एवं लेखिका।
कई साझा पुस्तकों में सहभागिता कर चुकीं हूँ।

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