सहनशीलता

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सहनशीलता के नाम पर
ना जाने कितने दिल टूट जाते हैं
ना आए आंखों में अश्रु
ये भी सहनशील बन जाते हैं ।
सहनशीलता गहना बन
नारी का श्रृंगार बन जाता है
सहनशीलता के नाम पर
ना जाने कितने दिल मिट जाते हैं ।
सहनशीलता की ओढ़नी ओढ़
आज फिर एक डोली उठ गई
ना गया किसी का कुछ भी
बस एक माँ की झोली लुट गई ।
सहनशीलता के नाम पर
ना उर का उद्गार दिखा
यादों को सजोये एक नारी का
मान और सम्मान लूटा।
सहनशीलता को अपनाकर
जीवन का सर्वस्व त्याग दिया
संवेदनाओ को मिटा कर
आज फिर एक दिल टूट गया।

डॉ वंदना खंडूरी
देहरादून उत्तराखंड
स्वरचित एवं मौलिक रचना

मैं डा. वन्दना खण्डूड़ी, देहरादून, उत्तराखंड से हूँ। मै बायलोजी की प्रवक्ता हूँ, मेरा साहित्य की ओर रुझान है। मुझे कविता ,कहानी तथा अनेक प्रकार की रचनाओं को सीखना अच्छा लगता है, खासकर मेरा रुझान साकारात्मकता की ओर होता हैं। नाकारात्मकता से मुझे परहेज है।

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