आस का पुष्प

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“विमला पानी पिला दे….!”खाँसते हुए बलवीर उठकर बैठ गया।”आहहहह यह खाँसी जान ले लेगी मेरी….!” विमला ने पानी का गिलास दिया और पीठ सहलाने लगी।

ऐ बापू क्या शोर मचा रखा है।चुपचाप नहीं सोया जा रहा तुझसे ?विक्रम कमरे में आकर जोरों से चिल्लाया।खाँस- खाँसकर नींद का कचरा कर दिया..!”

“विक्रम..! ऐसे बात करते हैं बापू से..? तुझसे सुबह ही कहा था कि बापू को दवाखाने ले जा,पर आवारागर्दी के अलावा कुछ और करता कहाँ है तू..?”

“वो मैं कुछ काम में उलझ गया था।तू याद दिला देती ना फिर से..!”

“किसे बबुआ..?तुझे..?तुझे इतनी फिकर होती तो बापू संग खेतों में हाथ बंटाने चला जाता? तीन दिन से चढ़े बुखार में हल जोत रहे हैं।

“काहे जोत रहे..? मैंने तो कहा नहीं..? चुपचाप आराम करते…!”

तोसे इसी जवाब की आशा थी लला..? विमला ने आँसू पोंछते हुए कहा और फिर बलवीर के लिए काढ़ा बनाने लगी।काढा पीकर खाँसी तो थोड़ी शांत हुई पर बुखार तेज होने से बलवीर की हालत गंभीर होने लगी।

“विक्रम…!ए बबुआ सुनो तो..!”विक्रम घर में होता तो सुनता।माँ बाप के हद से ज्यादा लाड़-प्यार से बिगड़ा विक्रम खलिहान में जाकर सो गया।

“रतन भाईसाहब..दरवाजा खोलिए..!”विमला ने पड़ोस के रतनलाल की कुण्डी बजाते हुए आवाज लगाई।

“अरे भौजाई..?सब ठीक तो है..?”

“कछु ठीक नहीं है भाईसाहब।रतिया बीत गई पर नेक भी बुखार नहीं उतरा..!”

“विक्रम कहाँ है..?”

“पता नहीं..? रात खाँसी बहुत थी तो बार-बार उसकी नींद टूट रही थी ‌ कहीं जाकर सोया होगा..?”

“आप तनिक चिंता न करो। रणधीर..!!!”

“जी बापू..?”

“जा बलवीर को दवाखाने ले जा। और सुन, गुड़िया के ससुराल जाकर खबर कर देना। दो-चार दिन को आ जाएगी तो भौजाई को आराम हो जाएगा..!”

“गुड़िया को काहे..?”विमला बोली।

“भौजाई तुम्हें और बलवीर को समझा-समझाकर थक गया कि उस पर जिम्मेदारी डालो,पर बच्चा बनाकर बिगाड़ जो रक्खा है उसे..!”

“अब जो है सो है। गुड़िया क्या कर लेगी आइके। बेकार बोझ ही बढ़ाएगी..!”विमला बोली।

“यही सोच के कारण यह तकलीफ़ झेल रहे हो तुम दोनों,माफ़ करना भौजाई बेटा तो तुम्हारा निकम्मा ठहरा।अब बिटिया भी नहीं चाहिए तो कौन करेगा।यह बताओ बिटिया बोझ कैसे?”

“रणधीर साल में एक बार आ पाता है। ज़रूरत पड़ने पर रेवा और दामाद आते हैं कि नहीं..?”हमारे लिए तो जैसा रणधीर वैसी ही रेवा है।

विमला रतनलाल की बात सुनकर मौन रही।

“भौजाई गुड़िया आ जाएगी तो दवाखाने आने-जाने का सहारा हो जाएगा। वैसे भी रणधीर की छुट्टी खत्म हो गई।वो आज ही वापस जा रहा है..!”

“इतनी जल्दी..?”विमला ने पूछा।

“नौकरी वालों का ऐसा ही है भौजाई।कहा था विक्रम की पढ़ाई पर ध्यान दो,पर आप दोनों के लाड़-प्यार से आज क्या हाल हुआ..?”

“अब जो हुआ सो हुआ भाईसाहब। बड़ी मन्नत मुरादों से मिला तो थोड़ी लापरवाही हो गई।अभी वो बच्चा है सुधर जाएगा..!”

“कब..?बीस का तो हो गया। मैं फिर कहता हूँ, गुड़िया के साथ भेज दो, उसके ससुर बहुत नियम धरम और अनुशासन वाले हैं, अभी सुधर जाएगा।देर करदी तो कहीं के नहीं रहोगे..!”

“नहीं गुड़िया के यहाँ नहीं जाएगा लल्ला।कौन बिटिया वालों का एहसान कौन ले..?”विमला यह कहकर घर के अंदर चली गई।

“पत्थर से सिर फोड़ना बेकार है..!” रतनलाल अपना माथा ठोककर अंदर चले गए। रणधीर बैलगाड़ी ले आया और बलवीर को लिटाकर दवाखाने ले गया।उधर से लौटते समय गुड़िया को साथ ले आया।

“अम्मा बापू इतने बीमार हैं और तुम्हारे राजदुलारे कहाँ हैं बताना..?”गुड़िया रणधीर की सहायता से बलवीर को चारपाई पर लिटाते हुए बोली।

“तू आते ही बबुआ के पीछे पड़ गई..? रणधीर लला तू बता डॉक्टर बाबू क्या बोले..?”विमला साड़ी के पल्लू से हाथ पोछती हुई आई।

“काकी वो बोले मौसमी बुखार है।कमजोरी के कारण इनकी हालत गंभीर बनी हुई है।खाँसी के कारण खेत जोतने को साफ-साफ मना कर दिए हैं..!

“हे भगवान..!”विमला बड़बड़ाई।

“अब भगवान का करे..? बीमारी तो खुद बढ़ाई है काका ने,गुड़िया यह दवा कैसे देनी है तुम्हें बता दिया है तो समय पर ही देना। काकी विक्रम को बोलो हरिलाल को साथ लेकर खेत जोतने का काम पूरा करे..!”इतना कहकर रणधीर चला गया।

“बबुआ यह सब कैसे करेगा..?सब हाथ धोकर पीछे पड़ गए हैं लल्ला के..!”विमला वापस बर्तन घिसने बैठ गई।

“कोई पीछे न पड़ा तेरे लल्ला के, तूने और बापू ने उसे बर्बाद करने में कोई कसर न छोड़ी।अब देख कैसे सही करती हूँ।आने दे उसे..!”गुड़िया तिलमिलाई।

“इसलिए मना किया था रणधीर को कि तुझे साथ न लाए।आते ही भाई के लिए क्लेश करने लगी।एक ही बेटा दिया भगवान ने..!”

“बेटियाँ दस-दस दी है,है ना अम्मा।हम भी तो अकेले ही हैं।हमसे कभी लाड़ नहीं लड़ाया?बस बोझ-बोझ सुन-सुनकर ससुराल भी चले गए,पर तुम्हारी सोच नहीं बदली?चल बता खाना क्या बनेगा? चूल्हे पर चढ़ा दूँ,तू यह सब छोड़ आराम कर..!”गुड़िया ने आते ही सब काम संभाल लिया।

“अरे दिदिया तू कब आई..?” विक्रम ने घर में गुड़िया को देखते ही सवाल किया।

“कहाँ था पहले यह बता..? दूसरे बापू को अस्पताल ले जाकर इलाज करा रहे हैं। तुझे तनिक भी लाज नहीं आती..?”

“अरे दिदिया…रात को बापू की खाँसी ने सोने नहीं दे रही थी तो खलिहान में जाकर सो गया।तू मोतीचूर के लड्डू लाई मेरे लिए..?”विक्रम उत्साह से गुड़िया का सामान टटोलने लगा।

“और जो बापू की तबीयत बिगड़ गई। तुम्हारा फर्ज नहीं, दवाखाने ले जाते..बोलो?”

“अब कानून मंत्री मत बनो। लड्डू लाई हो तो देदो, नहीं तो जै राम जी की..हम चले!”

“देख लो अम्मा अपने राजदुलारे को…?तू कहीं नहीं जा रहा समझे..?बैठ यही कुछ काम है। अम्मा अभी ससुर जी आने वाले हैं..!”

“समधी जी..? क्यों क्या कर दिया तूने..?”

“अरे अम्मा हम कुछ नहीं करे।बापू से मिल नहीं पाए इसलिए,उस समय वो जरूरी काम में व्यस्त थे नहीं तो दवाखाने में ही मिल लेते। अम्मा यहाँ से ज्यादा हमारी इज्जत सासरे में है।घर में सब काम बड़ी बहू से पूछकर होता है..!”गुड़िया गर्व से बोली।

“अम्मा हम पुलिया पर जा रहे..!”विक्रम उठकर जाने लगा।

“अरे रुक-रुक ससुर जी आ रहे हैं, उन्हें लेकर खेत में कौन जाएगा..?”गुड़िया ने पूछा।

“बापू देख लेंगे..अब ठीक हैं।है ना बापू..? देखो कैसे आराम से बैठे हैं..!”विक्रम जाता उससे पहले ही बाहर से गुड़िया के ससुर की आवाज सुनाई दी।

“बाबू आ गए हैं अम्मा..!”गुड़िया ने झटके से एक हाथ लंबा घूँघट खींच लिया।”विक्रम मूढ़ा उठा ला।यहाँ रख बैठने के लिए..हम चाय बनाने रखते हैं..!”

“पायं लागू बाबूजी..!”गुड़िया ने ससुर के पैर छुए और रसोई में चली गई। देखा-देखी विक्रम ने भी झुककर पैर छू लिए।

बलवीर उठने लगे तो, “अरे-अरे आराम करो बलवीर जी।अब कैसी तबीयत है..? रणधीर बता रहा था कि तीन दिन से बीमार हो..?”

“हाँ मौसम बदल रहा है इसलिए..थोड़ी सी तबियत नरम हो गई।यह गुड़िया है कि खेत में जाने ही नहीं दे रही,काम आधा पड़ा है..!”

“हम्म पता चला,बहू ने बताया सब!अभी भी शरीर गरम हो रहा है। लगता है बुखार पूरी तरह नहीं उतरा?तुम चिंता मत करो,आराम करो।हम है ना, तकलीफ़ में रिश्तेदार ही काम आते हैं।हम अपनी निगरानी में सब काम करवाकर जाएंगे..!”दशरथ बोले।तब तक गुड़िया चाय मठरी ले आई।

“चल विक्रम.. अपने खेतों में ले चल हमें..!”चाय पीकर दशरथ उठ खड़े हुए।

“बहुत-बहुत धन्यवाद समधी जी। आप जैसा रिश्तेदार मिलना मुश्किल है।बबुआ हरिलाल को लिवा ले जाना।समधी जी अपनी निगरानी सब करवा लेंगे..!”बलवीर बोले।

“अरे चिंता मत करो बलवीर जी..अपना यह बाँका छोरा है ना साथ,चल विक्रम..!”

“हरिलाल इसे सिखा हल कैसे पकड़ा जाता है.? पढ़ाई नहीं तो यह काम तो सीखे..!”

“बाबूजी मुझे सीखकर क्या करना..? अभी हरिलाल कर देगा,बाद में बापू हैं ना करने के लिए..?”विक्रम ने दबे स्वर में उनकी बात काटने की कोशिश की।

दशरथ का आस-पास के गाँव में बड़ा सम्मान था। छोटा-बड़ा हर व्यक्ति उनके आगे सोच-समझकर बोलता था।

“अपना काम खुद करना चाहिए। दूसरों के भरोसे ज़िंदगी नहीं चलती..समझे..?”दशरथ ने हरिलाल को छोड़कर विक्रम को काम पर लगा दिया और खुद पेड़ के नीचे आराम से बैठ गए।

“हाय दईया कैसा कुम्हला गया बबुआ।तू काहे मेरे छोरे से अपनी दुश्मनी निकालने आई है..?”फुसफुसाते हुए विमला बोली।

“अम्मा कुछ कहा..?”गुड़िया जोर से बोली तो विमला चुप हो गई। गुड़िया बापू को दवा देने चली गई।

“बापू तुम चिंता मत करो..सब सही हो जाएगा। विक्रम अभी नहीं सीखेगा तो कल क्या करेगा..? पढ़ाई छोड़ दी उसने, लाड़-प्यार में उसका भविष्य खराब हुआ जा रहा है..!”

“सही कह रही हो बिटिया.. तुम्हारी बात समझ आने लगी है हमें..!”बलवीर ने गुड़िया के सिर पर हाथ रखकर कहा।

“बलवीर जी मेहनत का फल मीठा होता है।जब विक्रम अपने हाथों से बोई फसल को बढ़ते देखेगा तो उसे भी अपने-आप पर गर्व होगा..!”

“जी सही कहा आपने..!”तय समय से पहले खेतों में जुताई-बुवाई सब हो गया। दशरथ गुड़िया को लेकर वापस लौट गए थे। बलवीर भी पहले से स्वस्थ हो गए थे।थोड़ा बहुत समय खेतों में बिताने लगे थे।

“विक्रम इस बार अंकुर बहुत अच्छे और जल्दी निकल आए।लगता है इस बार फसल हर बार से अच्छी होने वाली है..!”

“सच्ची बापू..!”

“वो तो होगी ही ना,इस बार खेतों में बबुआ ने जी-तोड़ मेहनत जो की है। कड़ी धूप में पसीना बहाया है..!”

“हाँ बेटा..इन बूढ़ी हड्डियों से अब उतनी ताकत से हल नहीं चलता जितनी ताकत से तूने चलाया।बीज भी बहुत अच्छी तरह लगा..!”

“बापू कल सुबह मैं भी चलूँगा खेतों में..!”विक्रम अपनी तारीफ़ सुनकर उत्साह से भर गया।

खेतों में निकले मेहनत के अंकुर देख”बापू अब से मैं खेतों की रखवाली करूँगा।आप जाओ घर पर आराम करो..!”

अपनी मेहनत को दिन रात तिल-तिल बढ़ता देख अब विक्रम का अधिकतर समय खेतों की रखवाली में बीतने लगा।बलवीर का अंदाजा सही था।फसल बहुत अच्छी हुई। बलवीर ने गुड़िया की शादी का बकाया कर्ज भी चुका दिया।

“बापू अब खेतों की जिम्मेदारी मुझपर छोड़कर तुम दूसरे काम देखो। अब यह काम मेरा..!”

“पर बबुआ तू अकेले कैसे..?”

“करने दे ना विमला..अपनी गुड़िया जो मेहनत का बीज बोकर गई, उसमें आशा का पुष्प महकने लगा है..!”

“गुड़िया कैसे..?यह सब तो समधी जी ने किया..?

“समधी जी को गुड़िया ही बुलाकर लाई थी।उसे मालूम था कि विक्रम को सही राह पर वही ला सकते हैं।सब सच ही कहते हैं विमला..जिस घर में बेटी पैदा होती हैं,वहाँ खुशियाँ के फूल खिलते हैं।हम जैसे लोग ही बेटी को बोझ समझकर उसे उसके हिस्से की खुशी नहीं दे पाते..!”

“बापू दिदिया आई है..!” विक्रम चहकता हुआ अंदर आया।”दिदिया इस बार मेरे लिए… विक्रम के बोलने से पहले ही गुड़िया बोल पड़ी।

“लाई हूँ बाबा,मोतीचूर के लड्डू के साथ-साथ कलाकंद भी है मेरे भाई के लिए,आजा.. गुड़िया बैग खोलने लगी। सबको खुश देखकर विमला की आँखों में खुशी के आँसू छलछला उठे।

©® अनुराधा चौहान’सुधी’स्वरचित ✍

 

1 COMMENT

  1. बहुत सुन्दर शिक्षाप्रद कहानी ।शुभ कामनाएं ।

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