“वंश चलाने की भूख”

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एक समय की बात है। हीरापुरा गांव में श्याम लाल का परिवार रहता था। इस परिवार को गांव के समृद्ध परिवारों में गिना जाता था। श्याम लाल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद से रिटायर्ड थे तथा उनकी पत्नी शकुंतला बैंक में मैनेजर पद पर कार्यरत थी। उनके एक बेटा था जिसका नाम समीर था। समीर नेे अभी-अभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी तथा नौकरी की तलाश में था।  भगवान की कृपा से घर में पैसे की कोई कमी नहीं थी। सारे गांव वाले उनके परिवार की बहुत इज्जत करते थे।

कुछ समय बाद समीर को पुणे में नौकरी मिल गई थी तथा एक महीने बाद जॉइनिंग करने के लिए पुणे जाना था। शकुंतला और श्यामलाल बेटे के नौकरी पर जाने की तैयारी करने लगे। भावुक होकर शकुंतला ने समीर को गले लगाया तथा पुणे के लिए विदा किया। नौकरी लगे अभी 1 साल भी नहीं हुआ था कि घर वाले शादी के लिए लड़की देखने लगे।

रविवार के दिन श्यामलाल और शकुंतला दोनों बगीचे में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। तभी अचानक फोन की घंटी बजी तो माली काका भागकर फोन उठा लाया। पुराने परिचित राम बाबू का फोन था। रामबाबू लगभग 15 साल पहले श्यामलाल के साथ नौकरी किया करता था। इतने दिनों बाद अचानक पुराने मित्र से बात करके रामलाल बहुत खुश हुआ। दोनों ही अपनी पुरानी यादों में खो गए। बातों ही बातों में कब आधा घंटा बीत गया पता ही नहीं चला।

घर परिवार वालों के हाल-चाल पूछते पूछते रामबाबू ने बताया कि उनकी बेटी सुधा इंजीनियरिंग पूरी कर महाराष्ट्र कंपनी में जॉब कर रही है तथा अब शादी लायक हो गई है। तभी रामबाबू ने यह भी बताया कि सुधा के लिए अब रिश्ता देख रहे हैं। कोई अच्छा लड़का मिल जाए तो चट मंगनी पट ब्याह भी कर देंगे। राम बाबू का बस इतना बोलना था कि श्यामलाल एकदम से बोला। अरे मेरे जिगरी यार रामबाबू लड़का ढूंढ क्या रहे हो, समझो मिल ही गया।

रामबाबू कुछ समझा नहीं तो ने बताया कि उनका बेटा समीर भी शादी लायक हो गया है तथा नौकरी भी करने लगा है। श्यामलाल की बातें सुनकर रामबाबू भी बहुत खुश हुआ। आपसी बातचीत के बाद दोनों ने निर्णय लिया कि बच्चों से बात करके शादी की बात को आगे बढ़ाएंगे। ऐसा बोलकर फोन रख दिया तथा श्यामलाल ने सारी बातें शकुंतला को बताई। शकुंतला भी रिश्ते के लिए तैयार हो गई।

शकुंतला की रिटायरमेंट में 3 साल के करीब बचे थे। स्वाभाव से शकुंतला थोड़ी लालची थी। श्याम लाल ने फोन करके समीर को सारी बातें बताई। पापा की बात सुनकर समीर एकदम से चुप हो गया। बार बार बहुत पूछने पर समीर बोला कि हम दोनों कंपनी में नौकरी करेंगे तो आपकी सेवा कौन करेगा। समीर की ऐसी बातें सुनकर शकुंतला ने कहा कि मुझे तो नौकरी वाली बहू ही चाहिए। मां की जिद के सामने समीर ने शादी के लिए हां भर ली।

लगभग 2 महीने बाद दिवाली का त्यौहार आया तथा संयोगवश सुधा और समीर का भी घर आना हुआ। दोनो परिवारों ने आपस में मिलने की योजना बनाई। समीर के घर वाले सुधा के घर गए तथा उसी दिन रिश्ता भी पक्का कर दिया। छुट्टियों के बाद सुधा और समीर दोनों वापस नौकरी पर चले गए। 4 महीने बाद शुभ मुहूर्त देखकर शादी की तारीख भी पक्की कर दी गई। तय समय पर सुधा और समीर शादी के बंधन में बंध गए।

सुधा ब्याहकर अपनी ससुराल आ गई। शादी के एक साल बाद शकुंतला भी रिटायर हो गई। घर पर रहकर शकुंतला का दिमाग अनपढ़ औरतों जैसा हो गया। सारा दिन मोहल्ले में औरतों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाती। समीर और सुधा की शादी को 4 वर्ष हो गए थे। आस पड़ोस की औरतें शकुंतला को बोलने लगी कि सुधा के बच्चे क्यों नहीं हो रहे। कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है।

वैसे तो पहले ही शकुन्तला का थोड़ा संकुचित दिमाग था। अब सारा दिन पड़ोस वाली औरतों की बातें सुनकर शकुंतला ओर ज्यादा वहमी हो चली थी। धीरे-धीरे शकुंतला ने सुधा को टोकना शुरू कर दिया। शुरुआत में तो सुधा चुप रही, लेकिन बाद में वह भी समीर को मां की शिकायत करने लगी। शकुंतला ने घर में कलेश कर सुधा की नौकरी छुड़वा दी।
श्यमलाल ने बार-बार शकुंतला को समझाया लेकिन उसने एक ना सुनी। आए रोज किसी न किसी झाड़-फूंक वाले के यहां चली जाती। इस हरकत से सुधा बिल्कुल टूट चुकी थी और समीर भी निराश रहने लगा था। समीर सुधा से बहुत प्यार करता था लेकिन मां के आगे नतमस्तक था।

आखिरकार एक दिन ऐसा आया जब शकुंतला ने समीर के साथ मिलकर सुधा को जलाकर मार दिया। पडोस में सबको बताया गया की सिलेंडर फटने से किचन में आग लग गई और सुधा जल गई। अत्यधिक तत्परता के साथ शकुंतला ने समीर की शादी वैशाली के साथ कर दी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

शादी के 5 साल बाद भी वैशाली के बच्चे नहीं हुए। वैशाली पढ़ी लिखी और समझदार लड़की थी। वह समीर के साथ चैकअप के लिए डॉक्टर के पास गई। चैकअप करवा कर दोपहर बाद दोनों घर आ गए। शाम को डॉक्टर की रिपोर्ट आई जो बेहद चौंकाने वाली थी।

इस रिपोर्ट में लिखा था कि समीर मर्द नहीं है वह कभी बच्चे पैदा नहीं कर सकता। इस घटना को समीर ब्रदाशत नहीं कर सका तथा हार्ट अटैक से निधन हो गया। शकुंतला के सिर्फ वंश चलाने की भूख ने सुधा और समीर की जिंदगी लील दी तथा वैशाली को जीते जी लाश बना दिया।

जन्म : 8 मई 1989 को हरियाणा के जिला भिवानी के गांव जूई खुर्द में। पति : राजेश पूनिया (महासचिव, काव्या खेल गांव संस्थान राजस्थान एवं ए.बी.वी.पी.के पूर्व जिला सहसंयोजक, चुरू)। शिक्षा : स्नातकोतर (अंग्रेजी, हिन्दी, समाजशास्त्र, लोकप्रशासन), बी.एड., ए.डी.सी.ए.। व्यवसाय : सैन्ट्रल को ऑपरेटिव बैंक जयपुर, राजस्थान में कार्यरत। खेल उपलब्धि : मार्शल आर्ट की अन्तर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता एवं पूर्व में राष्ट्रीय महिला क्रिकेट टीम की सदस्य। एक पुस्तक पिछले दिनों ही प्रकाशित हुई है, आत्म जागरूक नारी समृद्ध भारत पढ़ने के लिए क्लिक करें।

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  1. सुंदर कहानी। वंश चलाने की भूख ऐसी ही होती है।

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