श्राद्ध

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आज सुबह से ही घर में चहल-पहल थी। मयंक के पिता का श्राद्ध था। मयंक एक नामी डॉक्टर था। उसके अस्पताल में दिन भर मरीजों की लंबी लाइन लगी रहती। इतने बड़े डॉक्टर के पिताजी का श्राद्ध होने से आज उसके घर में विविध तरह के व्यंजन बन रहे थे। दो-तीन दिन पहले से ही मयंक अपनी पत्नी मयुरी को पापा की पसंद के बारे में बताये जा रहा था।
”मयुरी, पापा को मालपुआ, गुलाब जामुन, दाल की कचोरी और कांजी बड़े बहुत पसंद थे। इसलिए ये चीजे तो तुम जरूर बनाना। बाकि तुम्हारी जो इच्छा हो बनाओ।”
”आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मैं खाने का मेन्यु वो ही रखुंगी जो पापाजी को पसंद था। आखिर उनकी पसंद का ख्याल रखना मेरा कर्तव्य है।”
मयंक ने ग्यारह ब्राम्हणों को भोज पर बुलाया था। ब्राम्हणों को दक्षिणा में देने के लिए उसने ऑनलाइन पश्मीना शॉले मंगवाई थी। उसका कहना था कि ड्रेस तो सब लोग देते है। ठंड में ये गर्म ऊनी शॉल पंडितों के काम आयेगी। पापा की आत्मा भी ये देख कर खुश होगी कि मैं ने उनके श्राद्ध पर पंडितों को इतनी महंगी शॉले दी है!
अंदर के कमरे में बैठी मयंक की माँ के कानों में बेटे-बहू की आवाजे आ रही थी। वो कमरे में बैठे-बैठे नौकरों को भाग-दौड़ करते हुए देख रही थी। उन्होंने मयंक को आवाज लगाई।
”मयंक, इधर आना बेटा…”
”क्या है मम्मी? जल्दी बोलो…आज बहुत काम है!”
”बेटा, यदि तू नाराज न हो तो मैं तुझसे एक बात कहना चाहती हूँ।”
”क्या मम्मी आप भी! आपको तो पता है कि आज पापा का श्राद्ध है और आपको आज ही ऐसी वैसी बात करना है!”
”बेटा, मैं श्राद्ध के विषय में ही कुछ कहना चाहती हूँ।”
”क्या ब्राम्हणों को दक्षिणा ज्यादा देना है या पापा के पसंद की और कोई चीज बनवानी है?”
”नहीं बेटा। वो सब तो तुम लोग बराबर कर रहे हो।”
”तो फ़िर?”
”मेरी एक विनंती है कि प्लीज तेरे पापा के श्राद्ध के साथ-साथ मेरा भी श्राद्ध कर लिया कर ना!”
”ये क्या बोल रही हो आप? जिंदा इंसान का भी कभी श्राद्ध होता है क्या? शायद वृद्धावस्था से आप…आखिर आपके मन में ये बात आई भी कैसे?”
”बेटा, बुरा मत मानना। लेकिन यदि तेरे पापा के साथ-साथ मेरा भी श्राद्ध किया जाये तो मुझे कम से कम साल में एक दिन नए कपड़े और अच्छा खाना मिलेगा। तेरे पापा के नाम से तो सब कुछ पंडितों के पेट में ही जाता है। जीते जी मेरा श्राद्ध करने से वो सब पकवान सीधे मेरे पेट में जायेंगे। मुझे पता है कि मुझे शुगर है। लेकिन महीने-दो महीने में एकाध बार तो मिठाई खा सकती हूं न! फिलहाल तो मुझे याद भी नहीं कि पिछली बार मैं ने मिठाई कब खाई थी! बहुत मन करता है कि एकाध बार मिठाई खाऊं…थोड़ी सी ही सही…लेकिन तरस जाती हूं अच्छा खाना खाने को…!!!

मैं तुमसर, महाराष्ट्र की रहनेवाली हूं। मैं खुशियां बांटना चाहती हूं...चाहे वह छोटी-छोटी ही क्यों न हो! मैं ने 'आपकी सहेली' नाम से एक ब्लॉग (https://www.jyotidehliwal.com) बनाया है। मैं इस ब्लॉग के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधश्रद्धा दूर करने का, समाज में जागरुकता फैलाने का, किचन टिप्स और रेसिपीज के माध्यम से इंसान का जीवन सरल बनाने के कार्य में लगी हू। • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां प्रकाशित।• IBlogger ने मुझे Blogger of the year 2019 चुना था।

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