हे प्रभु यह क्या कर दिया

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“आज फिर एक मौत हो गई, पड़ोस के गांव में एक युवती के महामारी के दौरान मृत्यु हो गई, सुना है वह तो अस्पताल ही है तो क्या घर में देखे हैं एक बार”,,,,

पड़ोस वाली चाची ने घर से ही जोर से आवाज लगाकर कहा,,,,,,

कुछ पल सोचते हुए मैंने भी कह दिया” हां चलो देख आते हैं बच्चों का क्या हाल है वह तो वैसे भी अस्पताल में ही थी घर में कौन सा महामारी का डर है”

आसपास की दो चार महिलाओं के साथ मैं भी चल पड़ी मातम वाले घर में,,,,,,,

रास्ते में दुलारी का के बोल पड़ी”बड़ी भली मानुष थी बेचारी छोटे-छोटे बच्चे छोड़ गई”

मेरा मन फिर भर आया कुछ दिन पहले ही तो देखा था मैंने उसे  मुस्कुराते हुए,,,,,

रास्ते में दो चार महिलाएं और मिल गई जो वहीं सब बातें कर रही थी,,,,,

मेरा मन मानने को तैयार ही नहीं था कि,,,वह हंसता खिलखिलाता चेहरा अब इस दुनिया में नहीं है,,,,,

जैसे-जैस घर नजदीक आता गया मेरे हृदय गति बढ़ने लगी,

मेरे सामने छोटे-छोटे बच्चों का चेहरा घूमने लगा,,,,, कैसे जिएंगे वह अपनी मां के बगैर,,, हे प्रभु यह क्या कर दिया।

घर के आंगन में  पांच सात महिलाएं पहले से ही बैठी थी,,,

हम भी जाकर चुपचाप वहां बैठ गए,,,,

क्या कहें कहने को शब्द ही नहीं थे रास्ते भर में उसके बारे में बातें करने वाले शब्द खो गए थे कहीं,,,,

सास एक किनारे बैठे रो रही थी तो वहीं पास में एक छोटी सी बच्ची खेल रही थी हंसते मुस्कुराते हुए,,,,,,

उसे तो पता ही नहीं था कि उसकी मां उसे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी हैं,,,,

उसमें नन्ही सी बच्चे की मुस्कान देखकर दिल फिर भर आया,,, यह क्या कर दिया हे प्रभु यह क्या कर दिया,,,

सास रोते हुए बता रही थी परसों तो बिल्कुल ठीक थी,,, कल अचानक से बुखार आया अस्पताल ले गए जाने क्या हो गया और आज ही बिटवा यह खबर लेकर आया,,,,

“महेश घर आया है क्या “पड़ोस की चाची बोल पड़ी

“हां कुछ दिन पहले ही आया काम धंधा छूट गया था तो क्या करता”एक दूसरी महिला ने कहा,,,,

सभी अफसोस करने लगे हे प्रभु क्या कर दिया,,,,

थोड़ी देर बाद चाची बोली “रमेश कहां है देख आते हैं”

भीतर कमरे की ओर इशारा करते हुए महेश की अम्मा फिर से सुबकने लगी,,,

हमने डरते हुए  कमरे की ओर प्रवेश किया,,,,,

चारपाई पर रमेश लेटा हुआ छत को टकटकी लगाकर देख रहा था,,,

हमें भीतर की ओर आता देख उठ बैठा,,,

‘क्या हो गया बेटा ऐसा’चाची के बोलते ही रमेश की आंखों से आंसू टपक पड़े,,,,

“परसों तो ठीक थी चाची , अचानक बुखार आया अस्पताल लेकर गया, डॉक्टर ने बोला एडमिट करना पड़ेगा,, कुछ जांच वगैरह करवाई,,, और मुझे घर वापस जाने के लिए बोल दिया ,आज सुबह जब मैं खाना लेकर गया तो मुझे अंदर नहीं जाने दिया और मुझसे कहा अब नहीं रही,,,,

रमेश दहाड़ मार कर रोने लगा,,,,

रमेश को देखकर आंखें नम हो गई हम सबकी,,,,

तभी मेरी नजर दीवार पर टंगी तस्वीर पर गई,,,,,

हंसते मुस्कुराते हुए वही तस्वीर जो कब से मेरी आंखों के सामने घूम रही थी,,,

सब कुछ बदल गया,,,, नहीं बदला उसका वह मुस्कुराना और उस नन्ही बच्चे का वही खिलखिलाना,,,,,,

हे प्रभु यह क्या कर दिया,,,,

लेखिका, कवयित्री एवं समाजसेविका।
एक पुस्तक 'अधूरे अल्फाज' प्रकाशित हो चुकी है।

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