आज की नारी एक मर्दनी

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आंख को उठा के तू, जुबां से तू भी बात कर,

जहां भी चंड मुंड हैं ,त्रिशूल से आघात कर।

ये मौन अपना तोड़ देे,तू व्याधियों को मोड़ देे,

दानवों को खत्म कर, धड़ों को इनके काट कर।।

तू आदिशक्ति बन दिखा, प्रचण्ड रूप धार कर,

युद्ध में लड़कर दिखा,इन दुश्मनों को मार कर।

ना डर कभी ना मर कभी,तू घाव से उबर अभी,

सम्मान को बचा स्वयं,तू खड्ग से प्रहार कर।।

तू व्यर्थ ना समय गंवा,बेहराें को यूं पुकार कर,

तू न्याय की शुरवात है,ना न्याय की गुहार कर।

ये लोक लाज छोड़ देे,इन बन्दिशों को तोड़ देे,

अब वक्त है संहार का, तू वार बार बार कर।।

रक्तबीज फैले कई यहां,तू शेर सी दहाड़ कर,

तू रक्त पीकर के दिखा,तू खूब चीर फाड़ कर।

तू घमंड इनका तोड़ देे,सब हड्डियां मरोड़ देे,

इन दानवों को फेंक देे,जमीं से ही उखाड़ कर।।

मर्दनी बनकर दिखा,सिंह को भी उतार कर,

अबला का दाग त्याग देे,गूंज से ललकार कर।

तू आधार इस श्रृष्टि का,प्रयोग कर इस दृष्टि का,

खूब दर्द सह लिया,अब तू भी अत्याचार कर।।

 

मदन मोहन तिवारी, पथिक

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