कोविड में मंगल-गान (लघुकथा)

“जिज्जी! जीवन भर अपनी किस्मत को कोसते ही बीतेगी लगता है। लल्ला का ब्याह तय होते-होते हुआ भी तो इस लगन में कोरोना की आफत आ गई। बताइये! आज मेरे पास ऐसा कोई नही है जो ब्याह का मंगल-गान कर सके। मेरे तो सारे अरमान धरे रह गये। मेरे लल्ला का ब्याह सूना-सूना ही बीतेगा क्या?” फोन पर अपनी जेठानी से बात करते-करते तारा देवी रूआंसी हो उठीं, नयन पीत पत्रों की भाँति झरने लगे।

“क्या करोगी, इसे भी भाग्य का लिखा ही समझो। लक्ष्मी के श्री चरणों का आगमन हमारे घर में इसी कठिन काल मे निर्धारित हुआ था। समझो! मेरा स्वास्थ्य भी इतना उत्तम तो रहता नही। बच्चे परदेस से ही घर में एहतियातन कैद रहने का फरमान रात-दिन सुनाते रहते हैं। मेरा कलेजा तो आजकल ब्याह-गीतों की हूँक से फूला जा रहा है।” विवाह की तमाम रस्मों में शरीक ना हो पाने का मलाल तारा देवी की जेठानी को भी साल रहा था।

अकस्मात तारा देवी की आँखे चमचमा उठीं, “जिज्जी! सुनो। जब दुनिया में ‘वर्क फ्रॉम होम’ हो सकता है तो ‘सॉन्ग फ्रॉम फोन’ भी तो हो सकता है। जिज्जी! मैं अपनी बहनों-भाभियों समेत सभी देवरानी-जेठानी को एक साथ फोन पर वीडियो कॉल करती हूँ। सब बारी-बारी से वैसे ही गाएँगे जैसे एक जगह बैठ कर गाते हैं। गाइए जिज्जी, जी भर के गाइए, ढोलक-मजीरा सब बजेगा, मेरे लल्ला का ब्याह अब ऐसे ही सूना-सूना नही बीतेगा।”

घर के सारे फ़ोन एक मेज पर रख दिये गए। पूरा घर फोन से निर्झर हो रहे विवाह के मंगल-गान से गुंजायमान हो उठा था।

अध्यापन में हूँ। माँ हूँ। बौद्धिकता मानसिक खुराक है।

2 COMMENTS

  1. आंचलिक मिठास लिए प्यारी सी कहानी बहुत भाई !

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