लाॅक डाउन — (घर के कमरे से…)

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ये कहावत तो आपने भी बहुत सुनी होगी ” जंगल में मंगल मनाना ” हाँ, मैंने तो बहुत सुनी थी बचपन में चाहे उस समय इस कहावत का मतलब समझ में नहीं आता था । कई वर्षों तक तो मैं ‘मंगल’ का आशय सप्ताह के वार से ही समझता रहा । वो तो एक दिन छोटी कक्षा में गुरुजी ने इस कहावत के साथ मंगल का भी अर्थ बताया कि- मंगल का अर्थ प्रसन्नता या रुचि के अनुसार भी होता है तो समझ आया । मंगल शब्द का अर्थ जानकर एक असमंजस से छुटकारा तो मिला पर दूसरा प्रश्न अब सताने लगा कि जंगल में मंगल कहाँ होता है वहाँ तो जंगली हिंसक जानवर होते हैं और तो और ऐसा सुनने में भी आता है कि जंगल तो चोर-डकैतों का आश्रय भी हुआ करता हैं । और कभी-कभी तो इस कहावत को मैं, झूठी समझ, आम आदमी व गुरुओं पर भी शंका करने लगता । पर ये अवश्य कह सकता हूँ कि मैंने जंगल जाने वाले और जंगल से आने वाले व्यक्तियों को कभी अप्रसन्न देखा नहीं । पर ये बातें उस समय की है जब जंगल, जंगल ही थे,  आज के लुटे-पिटे जंगलों की तरह नहीं । इस प्रकार इंसान हर दिन जंंगल में मंगल मनाता रहा और सुखमय सदियाँ कटती रहीं । धीरे-धीरे सप्ताह के अन्य वारों में असंतोष पनपने लगा और वे सोचने लगे कि हमारे होने ना होने से इंसान को क्याा फर्क पड़ता है ,वह तो नित जंगल में  मंगल मनाता हैै और खुश रहता हैै । तो फिर सोम ने अपनेे रस से, बुध ने बुुद्धि से,गुरु ने ज्ञान से, शुक्र ने तेज से,  शनि ने अपनी चाल से और रवि ने अपनी आग से  इंसान की मति को फेरा और इसका असर ये हुुुआ कि इंसान अब जंगल को रोता-रोता जाने लगा और उतरा हुआ चेहरा लिए बापस आनेे लगा। अब जंगल में मंगल की बजाय दंंगल होने लगे । धीरे-धीरे जंगलों के चीर हरण होने लगे अर्थात पेेड़ कटनेे लगे । पेड़ों में देवताओंं का वास होता है ये धारणाएं भी मिथ्या लगने लगी । प्रकृति, द्रोपदी की भाँति गुहार लगाती रही पर किसी ने नहीं सुुनी । पेड़ कटते गयेे खेत बनते गये, गाँव उजड़ते गयेे शहर बसते गये। इंसान अपनी इस करनी पर प्रसन्न दिखाई देने लगा । पर उसकी प्रसन्नता ज्यादा स्थाई रह नहीं पाई लेकिन अपने झूठेे दंभ के कारण वह नजरअंदाज करता रहा । दुर्भाग्य ये रहा कि जो ईश्वर (प्रकृति) नेे हमें पंंचभूतों का अपार भंडार दिया था उनकी ही कमी स्पष्ट दिखाई देेेेने लगी । पानी बोतलोंं में और हवा तक बिकने लगी जब जंगल हुआ करते तो इंधन की कमी ना रहती पर अब तो  इंधन के रूप में  गैैस भी बिकने लगी थी । ये नहीं कि इस बीच में प्रकृति ने संकेत नहीं दिये हो पर फुर्सत ही कहाँ थी इंसान को जानने की, समझने की ।

अचानक मानो प्रकृति के धैर्य का बाँध फूट पड़ता है । एक सूक्ष्म वायरस (कोरोना) ना जाने कहाँ से विश्व पटल पर आ जाता है । इसने तो आज के इंसान के झूठे विकास की कलई मानो खोल ही दी । बड़े बड़े अस्पताल, पढ़े-लिखे डाक्टर, परिष्कृत दवाईया भी आदमी को मृत्यु से बचाने में असमर्थ सी दिखाई देने लगी । अच्छे ईलाज के बावजूद प्राण वायु की कमी से लोग दुनिया छोड़ने लगे । मृत्यु शैया पर इंसान को समझ आने लगा कि उसने क्या-क्या गलतियाँ की पर अब क्या हो- जब चिड़िया चुग गयी खेत । गो. तुलसीदास जी की ये चोपाई भी यहाँ सटीक बैठती है-  “का वर्षा जब कृषि सुखाने,,।

हाँ, पर बचे हुए इंसान अब चर्चा करने लगे हैं साथ ही उन्हें पेड़, नदी-नाले, पहाड़, पुरानी जीवन पद्धति का महत्व समझ आने लगा हैं पर ये ईश्वर की श्रेष्ठ कृति  इंसान संकट में तो याद करता है पर परिस्थिति बदलते ही भूलने में देर नहीं करता।

खैर, प्रकृति हमारी माँ है ईश्वर हमारे पिता हैं वे हम बच्चों की भूलों को भुला कर, हमारी रक्षा अवश्य करेंगे,,,,इस विश्वास के साथ,,,,।

–  व्यग्र पाण्डे

कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी (राज.)322201

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