लेख- विचारों का स्वास्थ्य पर प्रभाव

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एक छोटी सी कहानी है, आप ने भी सुनी होगी. एक लकड़हारा था. लकड़ी काट कर बेचता था. यही उस की आजीविका का साधन था. एक दिन जब वह लकड़ी काट रहा था तो किसी जीव ने उसे काट लिया. उस ने हाथ को झटका दिया. काटा होगा किसी ने, यह सोच कर उस ने पेड़ के खोखले में पत्थर का टुकड़ा घुसेड़ दिया.

10 वर्ष बीत गए. लकड़हारे का जीवन उसी तरह चलता रहा. इस दौरान वह पेड़ सूख गया. एक दिन लकड़हारे ने वही पेड़ काटा और उसे कुल्हाड़ी से फाड़ने लगा.

इस दौरान पत्थर पेड़ से छिटक गया. वह दूर जा गिरा. लकड़हारे को उस खोखले में सांप का ढांचा दिखाई दिया. यह देख कर लकड़हारा सन्न रह गया. उसे 10 साल पहले की घटना याद आ गई.

लकड़हारा सोचने लगा, ’10 वर्ष पहले मुझे सांप ने काटा था. उस का जहर मेरे खून में चढ़ा था और मैं आज तक जिंदा हूं. कहीं वह जहर मेरे खून में तो नहीं घूम रहा है?’

यह सोचसोच कर लकड़हारा घबरा गया. उसे ठंड के मौसम में भी पसीना आ गया. वह सीधा घर गया. तब से वह बीमार रहने लगा. फिर एक दिन वह मर गया.

लकड़हारा जहर से नहीं मरा था, जहर के भय ने उस के प्राण हर लिए. सब से पहले मस्तिष्क में उथलपुथल मची. उसे महसूस हुआ कि खून में जहर आज भी दौड़ रहा है. इसी विचार से उस कि शक्ति क्षीण होने लगी. उस के पाचन संस्थान ने काम करना बंद कर दिया. इस से खून में श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या घटने लगी और अंत में वह मर गया.

कई लोग इसी तरह विचारों की तीव्रता से अपनी जान गंवा देते हैं. उन्हें कहीं कोई बीमारी नहीं होती है. अत्यधिक खुशी या गम उन के मस्तिष्क में तीव्र वेग से विचार उत्पन्न कर देता है जिस का शरीर पर तुरंत प्रभाव पड़ता है. शरीर मस्तिष्क में उठे बवंडर को स्वास्थ्य पर संभाल नहीं पाता है. परिणामस्वरूप शरीर के कमजोर स्थल पर अवरोध उत्पन्न हो जाता है. इसी कारण वे असमय ही काल के ग्रास बन जाते हैं.

हम जैसा सोचते हैं, शरीर पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है. हम निराशाजनक बातें सोचते हैं तो शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है. सफलता और उन्नति की बातें सोचने से शरीर पर आशाजनक व उत्साहवर्द्धक और निश्चित प्रभाव पड़ता है.

शरीर क्षीण, दुर्बल, कमजोर और बेकार हो तो भी विचारों के झंझावातों से उस में शक्ति आ जाती है. भले ही वह व्यक्ति वर्षों से बीमार हो, पलंग से उठ नहीं पाता हो तो भी विचारों की तीव्रता उसे भलाचंगा कर देती है.

इसे हम एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं. एक वृद्धा लंबी बीमारी से ग्रस्त थी. वह चलफिर नहीं सकती थी. कभी पलंग से नीचे नहीं उतरी. ऐसी अवस्था में एक बार उस के बहू बेटे बाहर गए. उस वक्त वृद्धा और उस का पोता घर में थे. अचानक घर में आग लग गई. पोता आग से घिर गया. उस के सामने मौत नाचने लगी. बचने की कोई संभावना नहीं थी. वृद्धा चिल्ला पड़ी. वह खूब चिल्लाई पर आसपास कोई नहीं था, जो उस बच्चे को बचाता.

वृद्धा के पास कोई उपाय नहीं बचा, उस के दिमाग में विचारों का बवंडर उठ रहा था. अचानक उस ने निश्चय किया, ‘मैं बच्चे को नहीं मरने दूंगी.’ यह सोचते ही वृद्धा की नसों में खून दौड़ने लगा. वह उठ बैठी. वह दौड़ कर गई. आग में घुसी. बच्चे को उठा कर बाहर आ गई. जब वह सामान्य हुई तो अपनेआप को देख कर उसे घोर आश्चर्य हुआ. वह स्वयं चलफिर सकती थी.

उस वृद्धा में शक्ति कहीं बारह से नहीं आई थी. वह उस के अंदर थी. उसे विचारों ने बल दिया. उस के मस्तिष्क ने उसे चेताया. ‘बचा ले, तू बचाना चाहती है तो अपने पोते को, वरना उसे कोई नहीं बचाएगा और वह मर जाएगा.’

इसी विचार से उस के रक्त में विद्युत का संचार हुआ और वह दौड़ कर बच्चे को बचाने में सक्षम हो गई. वृद्धा की सक्षमता कहीं नहीं, उस के विचारों में बसी थी. यही क्षमता हम सब में है. बीमार व्यक्ति विचारों के बल पर स्वस्थ हो सकता है. यही कारण है कि कई ग्रामीण लोग गंगा जल पीने मात्र से स्वस्थ हो जाते हैं.

इन ग्रामीणजनों के स्वस्थ होने का राज उन का अपना विश्वास होता है. उन्हें गंगा जल पर अंधविश्वास है. वह उस के पीते ही स्वस्थ हो जाएंगे, यह मान्यता उन के मस्तिष्क में जम कर बैठी रहती है. फलत: गंगा जल पीने से वे कई बार स्वस्थ हो जाते हैं.

गंगा जल कोई औषधी नहीं है कि उस के पीने से हर कोई स्वस्थ हो जाए. मगर विश्वास, आस्था की दृढ़ता और शरीर की क्रिया इस में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. वे शीघ्र ठीक हो जाते हैं.

इसी विश्वास के कारण व्यक्ति नीमहकीम, ओझा और तंत्रमंत्र से ठीक होते देखे जाते हैं. उन तंत्रमंत्र, नीमहकीम और ओझा के पास कोई शक्ति नहीं होती है, न ही उन की दवा, झाड़फूंक काम करती है. व्यक्ति के स्वयं के विश्वास और उस से उपजे विचार ही उसे स्वास्थ्य लाभ देते हैं.

शरीर विचारों का दर्पण है. यह वही व्यक्त करता है जैसा विचार दिमाग या मस्तिष्क में चलता है. बीमार व्यक्ति को देखिए. वह कमजोर, कांतिहीन और कुरूप दिखाई देता है. वहीं प्रसन्न और सफलता से खुश किसी व्यक्ति को देखिए. उस के चेहरे की चमक, शरीर की स्फूर्ति, उत्साह व जोश देखने लायक होता है. यह सब कहीं से नहीं आता है. शरीर एक ही है.

उस पर कोई बाहरी प्रभाव उतना नहीं पड़ता है जितना आंतरिक प्रभाव. यही वजह है कि एक स्थिति में व्यक्ति अपने को स्वस्थ महसूस करता है, दूसरी स्थिति में अस्वस्थ और बीमार.

बीमार व्यक्ति के स्वास्थ्य सुधार की रफ्तार उस के विचारों पर निर्भर करती है. एक सफल, प्रसन्नचित व्यक्ति उसी तीव्रता से ठीक होता है जिस तीव्रता से उसे सफलता, प्रसन्नता महसूस होती है.

इस के ठीक विपरीत निराशावादी व्यक्ति को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है. ऐसे व्यक्ति का स्वास्थ्य सुधार उस की मनोदशा पर निर्भर करता है.

लता ने यह प्रयोग द्वारा सिद्ध किया है कि हमारे विचारों से हमारे स्वास्थ्य पर सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है. लता ने एक बार जीते हुए सैनिकों को सेवासुश्रूषा की थी. उस ने देखा कि जीत की खुशी से उल्लसित सैनिकों के घाव शीघ्र भर गए, जबकि हारे हुए सैनिकों के घाव देर से भरे

इस का कारण उन की अपनी विचारधारा और मनोदशा थी जिस ने उन के शरीर को उसी अनरूप ढाल दिया था. जीते हुए सैनिकों में उत्साह था. वे सोच रहे थे कि उन का श्रम सार्थक हो गया. वे जीत गए. अब वे शीघ्र स्वस्थ हो कर जीत का जश्न मनाएंगे. फलत: वे शीघ्र ही ठीक हो गए.

इसी के विपरीत हारे हुए सैनिक निराशा से ग्रस्त थे. उन्हें ग्लानि का अनुभव हो रहा था. वे सोच रहे थे कि वे हार गए. अब न जाने कब ठीक होंगे ? इसी कारण वे देर से ठीक हुए. इन सब बातों से यही पता चलता है कि हम जैसा सोचते हैं, शरीर के स्वास्थ्य पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है. इसलिए हमें अपनी सोच को सकारात्मक बनाना चाहिए ताकि हम स्वस्थ, प्रसन्न और सफल व्यक्तित्व के स्वामी बन सकें.

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ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’, पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़, जिला-नीमच (मध्यप्रदेश)-458226

नाम- ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश" | जन्म दिनांक-  26 जनवरी 1965 | शिक्षा- 5 विषय में एम ए, पत्रकारिता, कहानी-कला, लेख-रचना, फ़ीचर एजेंसी का संचालन में पत्रोपाधि* व्यवसाय- *सहायक शिक्षक | लेखन- बालकहानी, लघुकथा व कविता | संपादन- लघुकथा मंथन, बालकथा मंथन, चुनिंदा लघुकथाएं | प्रकाशित पुस्तकें- 1- लेखकोपयोगी सूत्र व 100 पत्रपत्रिकाएं कहानी लेखन महा विद्यालय द्वारा प्रकाशित, 2- कुएं को बुखार 3- आसमानी आफत 4- कौन सा रंग अच्छा है ? 5- कांव-कांव का भूत 6- रोचक विज्ञान बालकहानियाँ* 7- चाबी वाला भूत आदि | उपलब्धि- 111 बालकहानियों का 8 भाषा में प्रकाशन व अनेक कहानियां विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित | इ-बुक- 108 ebook प्रकाशित | पुरुस्कार- ●इंद्रदेवसिंह इंद्र बालसाहित्य सम्मान-2017,   ●स्वतंत्रता सैनानी ओंकारलाल शास्त्री सम्मान-2017 , ●बालशौरि रेड्डी बालसाहित्य सम्मान- 2015 , ●विकास खंड स्तरीय कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय 2017 , ●लघुकथा में जयविजय सम्मान-2015 प्राप्त, ●काव्य रंगोली साहित्य भूषण सम्मान- 2017 प्राप्त, ●26 जनवरी 2018 को नगर पंचायत रतनगढ़ द्वारा _वरिष्ठ साहित्यकार_ सम्मान 2018 , ●सोमवंशीय क्षत्रिय समाज इंदौर द्वारा _क्षत्रिय गौरव_ सम्मान 2018, ● नेपाल में _वरिष्ठ साहित्य साधक_ सम्मान 2018 , ●मेघालय के राज्यपाल के हाथों _महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान_-2018 प्राप्त, ●बालसाहित्य संस्थान उत्तराखंड द्वारा अखिल भारतीय राजेंद्रसिंह विष्ट स्मृति सम्मान बालकहानी प्रतियोगिता 2018 में तृतीय स्थान का सम्मान प्राप्त, ●नेपाल-भारत साहित्य सेतु सम्मान- २०१८, ●नेपाल-भारत अंतरराष्ट्रीय रत्न सम्मान- २०१८ (बीरगंज नेपाल )में प्राप्त . ●मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ द्वारा *रजत-पदक* से सम्मानित । ● क्रान्तिधरा अंतरराष्ट्रीय साहित्य साधक सम्मान-2019 से सम्मानित। | पता- पोस्ट ऑफिस के पास , रतनगढ़ जिला-नीमच -458226 (मध्यप्रदेश) मोबाइल- 09424079675 opkshatriya@gmail.com

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