शांति से मरना चाहते है तो अंगदान या देहदान करें!!

4
28

हम ज़िंदगी भर अपने-आप को कोसते रहते हैं कि ज़िंदग़ी में कुछ अच्छा करना चाहते थे लेकिन कर नहीं पाएं! काश, हम भी कुछ अच्छा कर पाते…काश, हम भी दान धर्म कर कर पुण्य कमा पाते…! क्या आपके मन में भी कभी-कभी ऐसे विचार आते है? यदि हां, तो अंधविश्वास छोडिए…अंगदान या देहदान कीजिए…!

अंगदान एवं देहदान में अंतर
शरीर के उपयोगी अंग जैसे आंखों की कॉर्निया, लीवर, हड्डी, त्वचा, फेफड़े, गुर्दे, दिल, टिश्यू इत्यादि का दान करना अंगदान कहलाता है। जबकि अपना संपूर्ण शरीर मेडिकल प्रयोग या अध्ययन हेतु दान देने को देहदान कहते है। एक शोध के अनुसार ब्रेन डेड व्यक्ति के दिल, फेफड़े समेत कुल 25 ऑर्गन किसी जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद हो सकती है, तो देहदान से चिकित्सा में विकास से पूरी मानव जाती लाभान्वित हो सकती है।

अंगदान या देहदान सर्वश्रेष्ठ दान है
अंगदान से जीवन मिलता है। सिर्फ़ भगवान ही नहीं, हम भी किसी को जीवन दे सकते है! यह सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ है। अंगदान के बिना देश में हर वर्ष 10 लाख मौते होती है। भारत में हर वर्ष जितने अंगो की आवश्यकता होती है उनमें से केवल 4% ही उपलब्ध हो पाते है। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार पश्चिमी देशों में 70-80% अंगदान होता है जबकि भारत में यह आंकड़ा सिर्फ़ 0.01% का है। आप ही सोचिए…जिस देश में एक कबुतर की जान बचाने के लिए राजा शिबि ने अपने जीवित शरीर को गिद्ध के लिए परोस दिया था, असुरो से रक्षार्थ महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियां दान कर दी थी, राजा ययाति के पुत्र पुरु ने अपना यौवन पिता को दान में दिया था, दानवीर कर्ण ने जीते जी अपने कवच-कुंडल दान में दिए थे, उसी भारत देश के लोग अंगदान या देहदान के मामले में इतने उदासीन कैसे हो सकते है? यदि महर्षि दधीचि जैसे धर्मज्ञ अपनी अस्थियां दान कर सकते है तो हमें डरने का कोई कारण नहीं है।

क्या हम इतने स्वार्थी है?
जरा सोचिए, यदि हमने अंगदान नहीं किया तो हमारा शरीर, क्या तो जलाया जाएगा या फ़िर दफ़नाया जाएगा। दोनों ही परिस्थिति में हमारे शरीर को तो नष्ट होना ही है। वो शरीर हमारे या हमारे परिवार वालों के कुछ भी काम नहीं आएगा। साथ ही किसी और के भी कुछ भी काम नहीं आएगा। ये तो यहीं बात हुई कि यदि कोई चीज हमारे काम की नहीं है तो हम उसे जलायेंंगे, दफनायेंगे या कुछ भी करेंगे लेकिन किसी को भी उसका उपयोग नहीं करने देंगे! क्या आज का पढ़ा-लिखा इंसान इतना स्वार्थी है?

शांति से मरना चाहते है तो अंगदान या देहदान करें
कहा जाता है कि मरते वक्त इंसान के आंखों के सामने उसकी जिंदगी के अत्यधिक सु:ख और दु:ख के पल किसी चल चित्र की भांती आते है। ऐसे में यदि हमने अंगदान या देहदान का संकल्प लेकर इसकी जानकारी अपने परिवार को दी है तो अंतिम समय में हम एक अजीब सी शांति महसूस करेंगे कि मरते-मरते भी हम पुण्य कमा रहें है! हम मरने के बाद भी किसी के काम आयेंगे! अत: यदि शांति से मरना चाहते है, तो अंगदान कीजिए।

अंगदान या देहदान के प्रति हमारी भ्रांतियां
• अंगदान या देहदान करने से मुक्ति नही मिलेगी
सभी धर्म यह बात मानते है कि अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही मिलता है। भगवान के घर में भ्रष्टाचार नहीं होता! स्वर्ग में हमारे साथ सिर्फ़ हमारे अच्छे कर्म ही जायेंगे! अंगो की आवश्यकता स्वर्ग में नहीं है! अत: यहां पृथ्वी पर अंगो को जलाने के बजाय उन्हें दान दीजिए। कहा जाता है कि पुण्य कर्मों की लिस्ट बड़ी होने पर ही हमें मुक्ति मिलती है। अंगदान या देहदान से पुण्यकर्मों की लिस्ट बढ़ने से हमें अवश्य ही मुक्ति मिलेगी।
• जिस अंग का हम दान कर रहे है अगले जन्म में हम उस अंग से वंचित रह जायेंगे
सभी धर्मो के अनुसार आत्मा अमर है। आत्मा एक पुराने शरीर को छोड कर दूसरे नए शरीर को धारण करती है, जैसे हम पुराने कपड़े छोड़ कर नए कपड़े पहनते है। यदि यह सच है तो शरीर का कोई भी अंग आत्मा के चोले की एक इकाई मात्र है, जैसे कपड़े का कॉलर या बटन! यदि हमारे शरीर को हम इस दृष्टिकोन से देखे तो जैसे आजकल महिलाओं द्वारा अपनी पुरानी साडियों की लेस या कसीदाकारी के फुल काट कर नए साडियों में लगाने से पुरानी साडियों का कुछ नहीं बिगडता है (क्योंकि वो तो वैसे भी किसी काम की नहीं थी) लेकिन नए साड़ी की सुंदरता में चार चाँद लग जाते हैं। ठीक वैसे ही हमारे द्वारा किए गए अंगदान से हमारा कुछ भी नुकसान नहीं होगा लेकिन किसी और के जिंदगी में चार चाँद लग जाएंगे। अत: यदि कोई इंसान इस जन्म में अपना दिल और किडनी दान में देता है तो भी अगले जन्म में उसकी आत्मा जो भी शरीर धारण करेगी उसके शरीर में भी दिल और किडनी ज़रूर रहेगी।

• अंगदान से पूरा शरीर विकृत हो जाता है
अंगदान में किसी मृत शरीर के उपयोगी अंगों को निकालकर शरीर को सही रूप में परिजनों को वापस दे दिया जाता है। अत: इससे शरीर विकृत नहीं होता।

• हम हमारे अपनों की लाश की चिरफ़ाड होते कैसे देख सकते है
मुझे एक बात बताइए…मरनेवाला व्यक्ति चाहे हमारा कितना भी निकट संबंधी हो…हमें हमारी जान से भी ज्यादा प्यारा हो…एक बार प्राण निकलने के बाद हम उसे जल्द से जल्द जलाना या दफ़नाना चाहते है की नहीं? यदि जलते वक्त हमारे अपनों के शरीर को दर्द नहीं होता तो अंगदान की शल्यक्रिया से उसे दर्द कैसे हो सकता है? हम इतनी नादानी भरी सोच कैसे रख सकते है कि शल्यक्रिया से एक मृत शरीर को दर्द हो सकता है!

अंगदान के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी
• कोई भी व्यक्ति अपने जीवनकाल के दौरान अपने अंग दान करने की प्रतिज्ञा ले सकता है। इन अंगदाताओं को डोनर कार्ड प्राप्त होगा, जिसके माध्यम से वह अंगदान कर सकते हैं।
• आमतौर पर व्यक्ति की मौत के बाद ही अंगदान किया जाता है, लेकिन कुछ अंगदान जीवित व्यक्ति के भी किए जा सकते है। जैसे एक किडनी, एक फेफड़ा, लीवर और आंतों का एक हिस्सा।
• अंगदान बहुत कम लोग कर पाते है क्योंकि यह ‘ब्रेन डेड’ होने पर ही किया जा सकता है।
• किसी भी व्यक्ति कि नैसर्गिक मृत्यु होने पर वह टिश्यु दान कर सकता है।
• किसी भी अंग को डोनर के शरीर से निकालने के बाद 6 से 12 घंटे के अंदर ट्रांसप्लांट कर देना चाहिए। कोई भी अंग जितना जल्दी प्रत्यारोपित होगा, उस अंग के काम करने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती है।
• कोई भी व्यक्ति चाहे, वह किसी भी उम्र, जाति, धर्म और समुदाय का हों, वह अंगदान कर सकता है।
• कैंसर, हेपेटाइटीस बी, एड्स, एच.आई.वी. पॉजिटिव जैसे बीमारी में अंगदान नहीं किया जा सकता।
• अंगदान करते वक्त परिजनों का कोई खर्च नहीं होता।

ऐसे कर सकते है अंगदान
• कई एनजीओ और अस्पतालों में अंगदान से संबंधित काम होता है। इनमें से कही भी जाकर हमें एक ऑर्गन डोनेशन का रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरना होगा। हम निम्न वेबसाइट पर जाकर फॉर्म भर सकते है एवं मन में कुछ भी शंकाएं होने पर इन वेबसाइट पर जाकर उन्हें पुछ भी सकते है। (जैसे कि www.notto.nic.in का टोल फ्री नम्बर है 1800 11 4770)
1) www.mohanfoundation.org
2) www.Organindia.org
3) www.notto.nic.in
• अपने परिवार को इसकी जानकारी ज़रूर दीजिए। क्योंकि हमारे मरने के बाद यह काम हमारे परिवार वालों को ही करना है। यदि हम फॉर्म नहीं भी भरते है तो भी यदि हमने हमारी अंगदान की इच्छा परिजनों को बता दी है तो वो अस्पताल में फोन कर सकते है।

ऐसे कर सकते है देहदान
• देहदान नैसर्गिक मौत होने पर ही संभव है। क्योंकि अपघात में मृत्यु होने पर या लावारिस शव का पोस्टमार्टम करना ज़रुरी होता है। पोस्टमार्टम के बाद शव एक माह भी सुरक्षित नहीं रखा जा सकता जबकि बिना पोस्टमार्टम के मृतदेह को वर्षों तक सुरक्षित रख सकते है।
• देहदान की इच्छा हम वसीयत में भी कर सकते है। यह कानून द्वारा मान्य है।
• देहदान करने का फॉर्म किसी भी मान्यता प्राप्त कॉलेज के एनाटॉमी विभाग से ही प्राप्त किया जा सकता है। ये फॉर्म अन्य जगहों पर नहीं मिलता।
• मृत्यु के बाद, देहदान जल्द से जल्द कर देना चाहिए ताकि बॉडी ख़राब न हो।
• यदि अपघात के कारण शरीर क्षत-विक्षत हो गया हो, शरीर किसी बडी शल्यक्रिया के कारण ख़राब हो गया हो तब ऐसी स्थिती में अस्पताल मृत शरीर लेने से इंकार कर सकते है।
• वास्तव में, अंगदान या देहदान करने से हमें दोबारा जिंदगी जीने का मौका मिलता है! इसलिए, अंत में सिर्फ़ इतना ही कहना चाहती हूं कि यदि आप चाहते है कि मरने के बाद भी आप किसी न किसी रूप में इस दुनिया में जीवित रहे…तो अंधविश्वास छोडिए…अंगदान या देहदान कीजिए…।

विशेष सुचना
• नैसर्गिक मौत होने की स्थिती में हम टिश्युदान या देहदान में से सिर्फ़ एक ही कर सकते है। टिश्यु में दोनों कॉर्निया, हड्डी, त्वचा, हृदय वाल्व, रक्त वाहिकाएं, नस और कण्डरा आते है।

जज्बे को सलाम-
एक ब्रिटिश लेखक रॉयस यंग को 19 वे हफ्ते में पता चल गया था कि बच्चा बिना ब्रेन का है, कुछ दिन ही जिंदा रहेगा। फिर भी उनकी पत्नी केरी ने उस बच्चे को जन्म दिया, ताकि उसके अंग डोनेट किए जा सके। सचमुच ऐसा कोई सुपर वुमन ही कर सकती है। उनके जज्बे को सलाम।

मैं तुमसर, महाराष्ट्र की रहनेवाली हूं। मैं खुशियां बांटना चाहती हूं...चाहे वह छोटी-छोटी ही क्यों न हो! मैं ने 'आपकी सहेली' नाम से एक ब्लॉग (https://www.jyotidehliwal.com) बनाया है। मैं इस ब्लॉग के माध्यम से समाज में व्याप्त अंधश्रद्धा दूर करने का, समाज में जागरुकता फैलाने का, किचन टिप्स और रेसिपीज के माध्यम से इंसान का जीवन सरल बनाने के कार्य में लगी हू। • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां प्रकाशित। • IBlogger ने मुझे Blogger of the year 2019 चुना था।

4 COMMENTS

  1. मैं आपके ब्लॉग्स को पढ़ती आयी हूँ, एक अपनापन से है आपके लेखन से बहुत ही उपयोगी लेख है इससे अधिकांश लोगों की आंख खुल यही कामना है ।

    • आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, सुप्रिया दी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here