हम कोविड को हराएंगे..

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हमारा जीवन कभी

ऐसा नहीं था,

हाँ कुछ गलती थी,

पर कुछ तो सही था|

 

दुःख थी, आशा थी,

मज़ा था, हर्ष था,

नियति की धूप छाँव में,

बीत रहा हर वर्ष था|

 

पर सुख दुःख का,

चोली दामन का साथ होता है,

हर चमकीली सुबह के बाद,

भयानक रात होता है|

 

मनुष्य पर छा गई,

अनायास एक महामारी,

ना जाने कहाँ से आ गई,

कोविड बिमारी|

 

इस बिमारी का स्वरुप,

इतना बड़ा है,

की बनकर काल,

यह हम सब पर खड़ा है|

 

अनिश्चित काल में इस,

सबके दिल में एक ग़म है,

सिसकता है कोई एवं

किसी की आँखें नम है|

 

तबाही ऐसा जग में,

मच रहा है,

नहीं कोई भी इससे,

बच सका है|

 

पढाई, काम और

व्यापार मंद है,

घरों में अपने अपने,

लोग बंद है|

 

चुनौती से घिरी,

ऐसी घडी है,

के भूमि लाखों के

शव से भरी है|

 

कोई कोविड बिमारी

से ग्रसित है,

कोई महंगाई के

डर से त्रसित है|

 

किसी की नौकरी भी

छिन चुकी है,

वो अपने कल को

ले कर के दुखी हैं|

 

बहुत से लोग,

हिम्मत खो रहे हैं,

जुदा अपनों से

होकर रो रहे हैं|

 

कोरोना दावानल सी,

छा रही है,

उम्मीदों को हमारे,

खा रही है|

 

ये सच है सुख से बढ़कर

आज जग में दुःख अधिक है,

ह्रदय में वेदना है और

सबका मन व्यथित है|

 

है फैली सब दिशा में,

काली मेघों सी निराशा,

परन्तु इसमें भी है,

रौशनी की सूक्ष्म आशा|

 

क्या कोविड आज हमको सीख

कुछ बतला रही है?

प्रलय के माध्यम से,

क्या वो कुछ जतला रही है?

 

यदि धरती जो अपने,

मुख से हमको बोल सकती,

तो भरकर आंसुओं से आज

हमको वो यह कहती|

 

नहीं कर्तव्य से अपने,

हे मनुज तुम दूर भागो,

संभल सकते अभी भी,

तुम किन्तु जल्द जागो|

 

अभी भी वक़्त है यदि,

खोलकर सब अपनी आँखें,

कुकर्मित और दूषित,

अपने हम कृत्यों में झाँकें|

 

रुक रुक कर महामारी,

मनुज पर जो है छाती,

यकीं मानो तो ये निज

दुष्कर्मों से है आती|

 

संसाधन के पीछे,

स्वार्थ से भर भागते हो,

की बन दम्भी स्वयं तुम,

दूसरे को मारते हो|

 

प्रदुषण को यदि तुम किसी

विधि जब थाम लोगे,

की चेतन, धैर्य और

सद्बुद्धि से तब काम लोगे|

 

के वन वृक्षों का जब

तुम साथियों पोषण करोगे,

नहीं यूँ व्यर्थ में,

तुम सृष्टि का शोषण करोगे|

 

अगर पशु पक्षी का तुम,

आगे बढ़ रक्षण करोगे,

नहीं सिर्फ स्वार्थ हेतु,

उनका तुम भक्षण करोगे|

 

यदि तुम सबको लेकर,

साथ में आगे बढ़ोगे,

दबे कुचलों के हक़ की,

जब कभी वाणी बनोगे|

 

तो स्वर्णिम दिन पुनः फिर,

लौट करके आएगा तब,

सभी की उन्नति होगी,

जगत मुस्काएगा तब|

 

हाँ माना बीच धारा में

फँसी पड़ी है कश्ती ,

पर हमसे भीड़ सके,

ऐसी कहाँ है किसकी हस्ती ?

 

चिकित्सक स्वास्थ कर्मी

को नमन है,

ऋणी उनका हमारा,

ये वतन है|

 

सुरक्षा कर्मी भी,

कुछ कम नहीं हैं,

असल जीवन के तो,

नायक वही हैं|

 

किन्तु साथियों कोविड,

की जंग अभी शेष है,

संयम, सावधानी की महत्त्व,

अब भी विशेष है|

 

हमारे बीच जब तक,

ये महामारी रहेगा,

हमारा युद्ध पूरी,

शक्ति से जारी रहेगा|

 

हर विघ्नों को कर पार,

हम आगे आएंगे,

थाम के सबका हाथ,

हम कोविड को हराएंगे|

An observer of shells on the bank of the great unascertained ocean of knowledge.

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