Thursday, November 26, 2020
prachi

Kavita Likho

मज़दूर व्यथा

मज़दूर व्यथा मैं एक मज़दूर हूँ , मैं किसे सुनाऊँ अपनी व्यथा । जिसका ना आदि है ना अंत है यही बन गई है मेरी जीवन कथा ।   आसान...

रिसते छाले

चाहे जितना भी सीऊँ अपने पाँव के छालों को जख्म रिसते ही रहते हैं। और, दर्द रूह तक को बेधता है। दूर है गाँव, अभी जाना है बहुत...

श्रमिक की व्यथा पर ( कोविड काल में)

मैं शापित हूँ पाँव के छालों और खाली पेट-तंत्र के मरोड़ों को साथ लिए हजारों कोस पैदल सड़क पर चल रहे रीढ़ की हड्डियों के लिए रीढ़विहीन सत्तासीनों से, अपेक्षा...

श्रमिक की व्यथा

कैसा आया दिवस ये,श्रमिक बना लाचार। खुशियाँ सारी छिन गई,पड़ी दोहरी मार। आधि-व्याधि में पिस रहा,श्रमिक गया सब हार। बैठा मक्खी मारता,भूख करे लाचार। भय कंपित जीवन हुआ,चिंता...

एक मजदूर की व्यथा !

मजबूर हैं, घर से दूर हैं , हाँ हम मजदूर हैं । दुश्वारियाँ ही दुश्वारियाँ... हमारी जिंदगी की दस्तूर है। घर,गाँव,खेत,नहर अपने पराये.. सिर्फ सपने में नजर आते हैं, चाहकर भी...

मरने के बाद जागती है सरकार !

जिंदा थे तो कोई पूछता न था देखो ! मर गये हैं कुचल कर/ कट कर सरकार हरकत में आई , दौड़ा प्रशासन लिए गाड़ी घोड़ा, कफ़न...

हाइकु-श्रमिक व्यथा

मील पत्थर~ मजदूर की आँखें शून्य की ओर। ज्येष्ठ मध्याह्न~ श्रमिक के पैरों से टपके लहू। ज्येष्ठ की धूप~ माता शव का हाथ खींचता शिशु। पैरों में छाले~ मील पत्थर ताके श्रमिक नेत्र। लाकडाउन~ श्रमिक शव पड़ा पटरी...

मौन हैं अनभिज्ञ नहीं !

वो आ रहे हैं पैदल ही नंगे भूखे पेट , नहीं है कोई जूतों के सेट सो बांध के प्लास्टिक की बोतल ही। वो आ रहे हैं...

श्रमिक पथिक

श्रमिक माँ  भारती का मैं ,  मैं केवल कर्म करता हूँ।   पत्थरी   राह चुनता  मैं ,  गमन में मौन करता हूँ।।    चली हैं आँधियाँ  ये  जो , चल...

बात करें हम आज श्रमिक की

औरों को दे महल बनाकर ख़ुद झोपड़ में रहता है बात करें हम आज श्रमिक की जिसकी व्यथा न कोई समझता है.. भर के आंखों में सपने वो गाँव...